नई दिल्ली। देश के चर्चित रोज वैली चिटफंड घोटाले में लंबे समय से न्याय का इंतजार कर रहे लाखों निवेशकों को आखिरकार बड़ी राहत मिलनी शुरू हो गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने ₹127.69 करोड़ की राशि 1.73 लाख से अधिक पीड़ित निवेशकों को वितरित की है। यह कदम न केवल आर्थिक राहत का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जांच एजेंसियां अब पीड़ितों को उनका पैसा वापस दिलाने की दिशा में सक्रिय और परिणाम देने वाली भूमिका निभा रही हैं।
अधिकारियों के अनुसार, यह वितरण कोलकाता जोनल कार्यालय और एसेट डिस्पोजल कमेटी (एडीसी) के संयुक्त प्रयासों का हिस्सा है। इस प्रक्रिया के तहत पहले जब्त की गई संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से नकदी में बदला जा रहा है और फिर उसे वैध दावेदारों तक पहुंचाया जा रहा है। इसका उद्देश्य ‘अपराध से अर्जित धन’ को वास्तविक पीड़ितों तक वापस पहुंचाना है, जिससे उन्हें आर्थिक न्याय मिल सके।
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जांच में सामने आया है कि रोज वैली समूह ने देशभर के निवेशकों से करीब ₹17,520 करोड़ की राशि जुटाई थी। इस दौरान लोगों को ऊंचे रिटर्न का लालच दिया गया, जिसके चलते लाखों लोगों ने अपनी जमा पूंजी निवेश कर दी। हालांकि, समय के साथ यह योजना धराशायी हो गई और करीब ₹6,666 करोड़ की राशि निवेशकों को वापस नहीं मिल सकी। इस घोटाले का असर पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा समेत कई राज्यों में व्यापक रूप से देखा गया।
ईडी ने इस मामले में अब तक करीब ₹1,568 करोड़ मूल्य की चल और अचल संपत्तियों को अटैच या जब्त किया है। इनमें जमीन, होटल, रिसॉर्ट, निवेश और अन्य वित्तीय परिसंपत्तियां शामिल हैं। एजेंसी का कहना है कि इन संपत्तियों की पहचान और जब्ती का उद्देश्य अधिकतम धनराशि की वसूली सुनिश्चित करना है, ताकि पीड़ितों को अधिक से अधिक राहत दी जा सके।
रिफंड प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर अप्रैल 2025 में सामने आया था, जब विशेष अदालत के आदेश के बाद ₹517.54 करोड़ की राशि एसेट डिस्पोजल कमेटी को सौंपी गई थी। इस राशि का उपयोग भी पीड़ितों को भुगतान करने में किया गया। अब ₹127.69 करोड़ की अतिरिक्त राशि के वितरण के साथ यह प्रक्रिया और गति पकड़ती नजर आ रही है।
इस पूरी प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और तेज बनाने के लिए तकनीक का व्यापक उपयोग किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, दावा और भुगतान प्रणाली को स्वचालित करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मंच तैयार किया गया है। इस मंच को न्यायिक मंजूरी भी मिल चुकी है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि भुगतान प्रक्रिया में किसी तरह की अनियमितता न हो।
नई व्यवस्था के तहत केवाईसी सत्यापन, दावों की जांच और भुगतान की प्रक्रिया को बहु-स्तरीय जांच के जरिए पूरा किया जा रहा है। इससे फर्जी दावों को रोका जा सकेगा और वास्तविक निवेशकों तक ही राशि पहुंचेगी। इसके अलावा, रिफंड पोर्टल को भी उन्नत किया गया है, जिससे दावों की प्रक्रिया तेज हो गई है और निवेशकों को लंबे इंतजार से राहत मिल रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल वित्तीय धोखाधड़ी मामलों में पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण की दिशा में एक बड़ा बदलाव है। आमतौर पर ऐसे मामलों में जांच लंबी चलती है और पीड़ितों को वर्षों तक अपने पैसे का इंतजार करना पड़ता है। लेकिन संपत्ति वसूली और पुनर्वितरण का यह मॉडल वित्तीय प्रणाली में विश्वास बहाल करने का एक प्रभावी तरीका बनकर उभर रहा है।
ईडी ने यह भी संकेत दिया है कि पश्चिम बंगाल में अन्य चिटफंड मामलों की जांच भी जारी है और वहां भी इसी तरह की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। एजेंसी का फोकस अब केवल दोषियों के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ितों को उनका हक दिलाना भी उतना ही महत्वपूर्ण लक्ष्य बन गया है।
अधिकारियों के मुताबिक, आने वाले समय में और भी संपत्तियों की पहचान, जब्ती और नीलामी की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। जैसे-जैसे अधिक संपत्तियां नकदी में बदली जाएंगी, वैसे-वैसे निवेशकों को और भुगतान किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया से लाखों लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है।
यह कार्रवाई एक मजबूत संदेश देती है कि बड़े वित्तीय घोटालों में भी पीड़ितों को न्याय मिल सकता है। साथ ही, यह भी स्पष्ट होता है कि अब जांच एजेंसियां केवल अपराधियों को पकड़ने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आर्थिक नुकसान की भरपाई सुनिश्चित करने की दिशा में भी ठोस कदम उठा रही हैं।
