लखनऊ। साइबर ठगी का एक बेहद चिंताजनक और संगठित मामला सामने आया है, जहां जालसाजों ने खुद को जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर एक 84 वर्षीय रिटायर ट्रेजरी अफसर को 27 दिनों तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखकर ₹84.50 लाख की ठगी कर ली। मामला सामने आने के बाद साइबर थाने में केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है, जबकि पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए ₹27 लाख की रकम चार बैंक खातों में फ्रीज भी कराई है।
व्हाट्सऐप वीडियो कॉल से शुरू हुआ डर का खेल
पीड़ित बदरुद्दीन, जो जानकीपुरम सेक्टर-जी के निवासी हैं, ने अपनी शिकायत में बताया कि सात मार्च को उन्हें व्हाट्सऐप पर एक वीडियो कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को लखनऊ पुलिस मुख्यालय का वरिष्ठ अधिकारी बताया और कहा कि उनके खिलाफ पुणे में मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज है। शुरुआत में ही उन्हें जेल भेजने की धमकी दी गई, जिससे वह बुरी तरह डर गए।
इसके बाद कॉल को दूसरे व्यक्ति को ट्रांसफर किया गया, जिसने खुद को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) का अधिकारी बताया। उसने कहा कि बदरुद्दीन के नाम से पुणे में एक बैंक खाता खोला गया है, जिसका इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग के लिए किया गया है। इस आधार पर उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ में लिया जा रहा है और जांच पूरी होने तक उन्हें किसी से भी संपर्क नहीं करने दिया जाएगा।
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फर्जी अरेस्ट वारंट और सर्विलांस का दबाव
जालसाजों ने इस दौरान बेहद पेशेवर तरीके से पूरे घटनाक्रम को अंजाम दिया। उन्होंने व्हाट्सऐप पर कोर्ट के फर्जी अरेस्ट वारंट भेजे और लगातार यह दावा करते रहे कि पीड़ित पर सर्विलांस के जरिए नजर रखी जा रही है। उन्हें यह भी चेतावनी दी गई कि अगर उन्होंने किसी को इस बारे में बताया, तो तुरंत उनके घर पर छापा मारकर गिरफ्तारी कर ली जाएगी।
डर और दबाव में आकर बुजुर्ग पीड़ित पूरी तरह जालसाजों के नियंत्रण में आ गए। आरोपियों ने उनसे उनके बैंक खातों की पूरी जानकारी ली और कहा कि जांच पूरी होने के बाद सभी पैसे वापस कर दिए जाएंगे। इस भरोसे में आकर बदरुद्दीन ने चार अलग-अलग बैंक खातों में किस्तों में कुल ₹84.50 लाख ट्रांसफर कर दिए।
27 दिनों तक मानसिक दबाव में रखा गया
यह ‘डिजिटल अरेस्ट’ 7 मार्च से लेकर 4 अप्रैल तक चला, यानी करीब 27 दिनों तक पीड़ित मानसिक दबाव और डर में रहा। इस दौरान जालसाज लगातार संपर्क में बने रहे और नई-नई मांगें रखते रहे। आखिरकार, जब उनकी मांगें बढ़ती ही गईं, तो पीड़ित को शक हुआ। उन्होंने कॉल काटकर अपने एक रिश्तेदार को पूरी बात बताई, जिसके बाद उन्हें एहसास हुआ कि वे साइबर ठगी का शिकार हो चुके हैं।
जब उन्होंने दोबारा जालसाजों से संपर्क करने की कोशिश की, तो सभी नंबर बंद मिले। इसके बाद उन्होंने साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई। जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि ठगी की रकम ‘ज्वेलिन इंटरप्राइजेज’ नाम की फर्म समेत कई अन्य खातों में ट्रांसफर कराई गई थी, जो विशाल मेघवात, अभिजीत भौमिक और फरहान के नाम से संचालित थे।
चार खातों में ₹27 लाख फ्रीज
साइबर पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इन चार बैंक खातों में जमा ₹27 लाख की रकम फ्रीज कर दी है और बाकी रकम के ट्रेल को ट्रैक करने की कोशिश की जा रही है। मामले में शामिल अन्य आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी के प्रयास जारी हैं।
इस मामले पर एक साइबर विशेषज्ञ का कहना है कि “डिजिटल अरेस्ट” जैसे फ्रॉड में अपराधी जांच एजेंसियों का नाम लेकर डर और दबाव का माहौल बनाते हैं। वे फर्जी दस्तावेज और वीडियो कॉल के जरिए भरोसा जीतते हैं और फिर धीरे-धीरे पीड़ित को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। खासतौर पर बुजुर्ग लोग ऐसे मामलों में ज्यादा संवेदनशील होते हैं।
यह घटना एक बार फिर चेतावनी देती है कि कोई भी जांच एजेंसी कभी भी फोन या वीडियो कॉल के जरिए गिरफ्तारी या पैसे ट्रांसफर करने के निर्देश नहीं देती। ऐसे किसी भी कॉल या मैसेज पर तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए और बिना देरी किए पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करना चाहिए। फिलहाल, पुलिस इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलने में जुटी है, जबकि पीड़ित को अपनी जीवनभर की कमाई वापस मिलने की उम्मीद है।
