कनाडा इमिग्रेशन फ्रॉड केस में फर्जी दस्तावेज रैकेट का भंडाफोड़ हुआ, CBSA जांच में 31 आवेदनों में हेरफेर सामने आया।

बैंक के भीतर से ही सेंध: प्री-अप्रूव्ड लोन के नाम पर ₹4.74 लाख की ठगी, दो बैंक कर्मचारियों समेत चार गिरफ्तार

Team The420
5 Min Read

गुरुग्राम। बैंकिंग सिस्टम की सुरक्षा पर सवाल खड़े करने वाला एक संगठित फ्रॉड सामने आया है, जिसमें प्री-अप्रूव्ड लोन के नाम पर एक फैक्ट्री कर्मचारी के खाते से ₹4.74 लाख की ठगी कर ली गई। चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे रैकेट में बैंक के ही कर्मचारियों की संलिप्तता सामने आई है। मामले में अब तक दो बैंक कर्मचारियों समेत चार आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि जांच एजेंसियां इस नेटवर्क के व्यापक फैलाव की पड़ताल कर रही हैं।

पहली EMI कटने पर खुली धोखाधड़ी

पीड़ित दिनेश कुमार (33), जो मानेसर स्थित एक निजी फैक्ट्री में काम करते हैं, को इस धोखाधड़ी का पता तब चला जब उनके खाते से ₹12,585 की अनधिकृत कटौती हुई। यह रकम दरअसल उस लोन की पहली ईएमआई थी, जो उनके नाम पर बिना उनकी जानकारी के लिया गया था। जब उन्होंने बैंक से संपर्क किया, तो सामने आया कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने उनके खाते से जुड़ा मोबाइल नंबर बदल दिया और उसी के जरिए ₹4.74 लाख का प्री-अप्रूव्ड लोन निकाल लिया।

घटना से घबराए दिनेश ने तुरंत साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई। 11 दिसंबर को धोखाधड़ी का केस दर्ज होने के बाद जब जांच शुरू हुई, तो अधिकारियों को संदेह हुआ कि इस फ्रॉड में कोई ऐसा व्यक्ति शामिल है, जिसे बैंकिंग सिस्टम की गहरी जानकारी है और जिसे ग्राहकों के संवेदनशील डेटा तक पहुंच प्राप्त है।

FCRF Academy Launches Premier Anti-Money Laundering Certification Program

बैंक के अंदर से ग्राहक डेटा लीक होने का शक

जांच धीरे-धीरे एक बड़े रैकेट की ओर इशारा करने लगी, जिसमें बैंक के अंदर से ही ग्राहक डेटा लीक कर ठगी को अंजाम दिया जा रहा था। पुलिस के मुताबिक, इस मामले का मास्टरमाइंड एक बैंक का डिप्टी मैनेजर था, जो दिल्ली स्थित एक शाखा में कार्यरत था। उसने अपने सहयोगी, जो गुरुग्राम में एक अन्य बैंक में कर्मचारी था, के साथ मिलकर इस योजना को अंजाम दिया।

आरोप है कि सहयोगी बैंक कर्मचारी सिस्टम के जरिए ऐसे खातों की पहचान करता था, जिन पर प्री-अप्रूव्ड लोन की सुविधा उपलब्ध थी। इसके बाद वह खाताधारकों की गोपनीय जानकारी निकालकर मास्टरमाइंड को उपलब्ध कराता था। इस डेटा के आधार पर आगे की साजिश रची जाती थी।

सिम कार्ड और मोबाइल नंबर बदलकर खाते पर कब्जा

जांच में सामने आया कि तीसरे आरोपी ने इस जानकारी का इस्तेमाल करते हुए सिम कार्ड हासिल किए और बैंक खातों से जुड़े मोबाइल नंबर बदल दिए। मोबाइल नंबर बदलने के बाद इंटरनेट बैंकिंग के जरिए आसानी से लोन प्रोसेस किया गया और रकम निकाल ली गई। इस पूरी प्रक्रिया को इस तरह अंजाम दिया गया कि पीड़ित को इसकी भनक तक नहीं लगी।

पुलिस ने बताया कि इस मामले में अब तक चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें दोनों बैंक कर्मचारी भी शामिल हैं। पूछताछ के दौरान आरोपियों ने कई अहम खुलासे किए हैं, जिनसे संकेत मिलते हैं कि यह गिरोह अन्य लोगों को भी इसी तरह निशाना बना चुका हो सकता है।

अन्य खातों में भी फ्रॉड की जांच

जांच एजेंसियां अब संबंधित बैंकों से संपर्क कर यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या इस तरह की घटनाएं अन्य खातों के साथ भी हुई हैं। साथ ही, यह भी जांच की जा रही है कि बैंकिंग सिस्टम में किस स्तर पर सुरक्षा चूक हुई, जिससे इस तरह की संवेदनशील जानकारी लीक हो सकी।

पीड़ित दिनेश कुमार ने बताया कि उन्हें अभी तक उनकी रकम वापस नहीं मिली है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बैंक की ओर से उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला और उनकी शिकायतों पर समय पर ध्यान नहीं दिया गया।

अंदरूनी मिलीभगत बना बैंकिंग सुरक्षा के लिए खतरा

यह मामला एक बार फिर यह दर्शाता है कि साइबर और बैंकिंग फ्रॉड अब केवल बाहरी हैकर्स तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि अंदरूनी मिलीभगत भी एक बड़ा खतरा बनकर उभर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि बैंकों को अपने डेटा सुरक्षा तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है, साथ ही कर्मचारियों की गतिविधियों पर भी सख्त निगरानी रखनी चाहिए।

फिलहाल, पुलिस इस पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश में जुटी है कि इस रैकेट के तार कहां-कहां तक जुड़े हुए हैं।

हमसे जुड़ें

Share This Article