चेन्नई। बैंकिंग सेक्टर से जुड़े एक और बड़े वित्तीय घोटाले का खुलासा हुआ है, जहां Central Bureau of Investigation (CBI) ने एक टेक्सटाइल कंपनी, उसके पूर्व प्रमोटर्स और बैंक अधिकारियों के खिलाफ ₹11.97 करोड़ के लोन फ्रॉड के मामले में केस दर्ज किया है। यह कार्रवाई IDBI Bank की शिकायत के आधार पर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि कंपनी ने साजिश के तहत लोन लेकर उसे गलत तरीके से इस्तेमाल किया।
मामले की शुरुआत IDBI बैंक की चेन्नई स्थित सैदापेट शाखा से हुई शिकायत से हुई, जहां नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) मैनेजमेंट ग्रुप की जनरल मैनेजर द्वारा लिखित शिकायत दी गई थी। शिकायत में बताया गया कि Sri Lakshmi Saraswathi Spintex Limited नामक कंपनी और उसके पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने बैंक से विभिन्न क्रेडिट सुविधाएं हासिल करने के लिए कथित रूप से फर्जी और भ्रामक जानकारी का इस्तेमाल किया।
CBI द्वारा दर्ज एफआईआर में कंपनी के पूर्व अधिकारियों—बी. सरथ चंद्रा, सीएस आदित्य प्रवीण और एस. नवीन चंद्रा—को आरोपी बनाया गया है। इसके अलावा, IDBI बैंक के कुछ अज्ञात लोक सेवकों और अन्य निजी व्यक्तियों के नाम भी जांच में शामिल किए गए हैं। जांच एजेंसी का मानना है कि यह मामला केवल कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बैंकिंग सिस्टम के भीतर भी संभावित मिलीभगत की आशंका है।
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शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने बैंक से लोन लेने के बाद उस राशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए नहीं किया, बल्कि उसे डायवर्ट और गबन किया। इस पूरी प्रक्रिया के चलते बैंक को ₹11.97 करोड़ का नुकसान हुआ। संबंधित लोन खाते को 28 फरवरी 2019 को NPA घोषित कर दिया गया था, और बाद में इसे धोखाधड़ी (फ्रॉड) की श्रेणी में रखा गया।
जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपियों ने लोन स्वीकृति प्रक्रिया के दौरान बैंक को गुमराह किया और फर्जी दस्तावेजों के जरिए अपनी पात्रता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। इसके बाद, जब लोन की राशि जारी हुई, तो उसे अलग-अलग खातों और माध्यमों के जरिए घुमाया गया, जिससे उसके वास्तविक उपयोग को छिपाया जा सके।
CBI ने इस मामले में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सार्वजनिक सेवकों द्वारा आपराधिक कदाचार जैसे गंभीर आरोप दर्ज किए हैं। एजेंसी अब इस बात की जांच कर रही है कि लोन मंजूरी के दौरान किन-किन स्तरों पर नियमों की अनदेखी की गई और क्या बैंक के अंदरूनी अधिकारियों ने जानबूझकर इस प्रक्रिया को आसान बनाया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला बैंकिंग सेक्टर में बढ़ते एनपीए और कॉरपोरेट धोखाधड़ी के खतरे को एक बार फिर उजागर करता है। खासकर जब कंपनियां फर्जी दस्तावेजों और अंदरूनी मिलीभगत के जरिए बड़े लोन हासिल कर लेती हैं और बाद में उन्हें चुकाने में विफल रहती हैं, तो इसका सीधा असर बैंकिंग प्रणाली और आम ग्राहकों पर पड़ता है।
CBI की जांच अब इस दिशा में आगे बढ़ेगी कि फंड्स को किन-किन खातों में ट्रांसफर किया गया, क्या किसी शेल कंपनी का इस्तेमाल किया गया, और इस पूरे नेटवर्क में कितने लोग शामिल थे। इसके साथ ही, यह भी देखा जाएगा कि क्या इस मामले में अन्य वित्तीय संस्थानों या बाहरी एजेंसियों की भी कोई भूमिका रही है।
यह मामला एक बार फिर यह सवाल उठाता है कि बैंकिंग सिस्टम में लोन स्वीकृति और मॉनिटरिंग प्रक्रिया को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है। यदि समय रहते ऐसी अनियमितताओं का पता लगाया जाए, तो बड़े वित्तीय नुकसान से बचा जा सकता है।
CBI की यह कार्रवाई स्पष्ट संकेत देती है कि वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में अब जांच एजेंसियां अधिक सख्ती बरत रही हैं। आने वाले दिनों में इस केस में और भी खुलासे होने की संभावना है, जो यह तय करेंगे कि इस ₹12 करोड़ के घोटाले के पीछे असली साजिश कितनी गहरी थी और इसमें कौन-कौन लोग शामिल थे।
