बीजिंग/वॉशिंगटन। वैश्विक टेक जगत में हलचल मचाने वाले एक बड़े फैसले में चीन ने अमेरिकी टेक दिग्गज Meta द्वारा प्रस्तावित लगभग ₹16,600 करोड़ के अधिग्रहण को रोक दिया है। यह अधिग्रहण सिंगापुर स्थित AI स्टार्टअप Manus से जुड़ा था, जो उन्नत “AI एजेंट” विकसित करने के लिए जाना जाता है। इस फैसले को चीन की बढ़ती टेक-नियामक सख्ती और अमेरिका-चीन के बीच AI वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है।
चीन के शीर्ष आर्थिक नियामक निकाय National Development and Reform Commission (NDRC) ने स्पष्ट रूप से इस सौदे को रद्द करने का निर्देश देते हुए कहा कि “Manus परियोजना के अधिग्रहण में विदेशी निवेश पर रोक लगाई जाती है” और संबंधित पक्षों को इस सौदे से पीछे हटना होगा। इस कदम ने यह संकेत दे दिया है कि अब चीन अपने घरेलू टेक सेक्टर में विदेशी, खासकर अमेरिकी निवेश को लेकर बेहद सतर्क रुख अपना रहा है।
दरअसल, Meta ने दिसंबर 2025 में इस अधिग्रहण की घोषणा की थी। कंपनी का दावा था कि Manus की AI एजेंट टेक्नोलॉजी को अपने प्लेटफॉर्म—फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप—पर लागू कर वह अरबों यूजर्स तक उन्नत ऑटोमेशन सेवाएं पहुंचा सकेगी। AI एजेंट्स ऐसी तकनीक हैं, जो बिना मानवीय हस्तक्षेप के जटिल कार्य—जैसे ट्रैवल प्लानिंग, कस्टमर सपोर्ट या बिजनेस प्रेजेंटेशन तैयार करना—स्वत: कर सकते हैं।
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हालांकि, चीन सरकार ने इस डील को सिर्फ एक कॉर्पोरेट सौदे के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे रणनीतिक तकनीकी नियंत्रण के नजरिए से परखा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीजिंग ने हाल के हफ्तों में कई घरेलू टेक कंपनियों को यह चेतावनी भी दी है कि वे किसी भी अमेरिकी निवेश को स्वीकार करने से पहले सरकारी मंजूरी जरूर लें। यह नीति बदलाव सीधे तौर पर Manus डील के बाद सामने आया है।
Manus, जिसकी शुरुआत बीजिंग में हुई थी और अब इसका मुख्यालय सिंगापुर में है, ने इस डील को अपने AI एजेंट रिसर्च की “वैश्विक मान्यता” बताया था। लेकिन चीन के इस फैसले ने कंपनी की विस्तार योजनाओं पर अनिश्चितता खड़ी कर दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम अमेरिका और चीन के बीच तेजी से बढ़ती AI प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है। वर्तमान में दुनिया के सबसे उन्नत AI मॉडल्स का विकास मुख्य रूप से इन दोनों देशों में हो रहा है। इसी बीच, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने भी हाल ही में दावा किया था कि AI तकनीक में अमेरिका चीन से काफी आगे है, जिसे व्हाइट हाउस ने “सीधी प्रतिस्पर्धा” करार दिया है।
चीन का यह फैसला न केवल एक व्यापारिक समझौते को प्रभावित करता है, बल्कि यह वैश्विक टेक निवेश के भविष्य के संकेत भी देता है। खासकर AI जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अब राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा नियंत्रण और तकनीकी संप्रभुता प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार, आने वाले समय में इस तरह के और भी फैसले देखने को मिल सकते हैं, जहां सरकारें रणनीतिक तकनीकों को विदेशी प्रभाव से बचाने के लिए हस्तक्षेप करेंगी।
इस घटनाक्रम का असर वैश्विक निवेश माहौल पर भी पड़ सकता है। टेक कंपनियों के लिए क्रॉस-बॉर्डर अधिग्रहण अब पहले जितने सरल नहीं रह गए हैं। विशेष रूप से AI सेक्टर में, जहां नवाचार और डेटा दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, वहां भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर व्यापारिक निर्णयों पर पड़ रहा है।
कुल मिलाकर, Meta और Manus के बीच प्रस्तावित यह डील भले ही रद्द हो गई हो, लेकिन इसने यह साफ कर दिया है कि AI की वैश्विक दौड़ अब केवल तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक हितों का भी बड़ा मैदान बन चुकी है।
