इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹42 लाख के पोंजी निवेश ठगी मामले में FIR रद्द करने से इनकार करते हुए निवेश घोटालों पर सख्त टिप्पणी की।

अलेक्जेंडर जैसा आत्मविश्वास, भीतर अनैतिकता’: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹42 लाख पोंजी ठगी केस में FIR रद्द करने से किया इनकार

Team The420
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प्रयागराज:  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ₹42 लाख के कथित पोंजी और निवेश घोटाले से जुड़े मामले में FIR रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपी में “अलेक्जेंडर जैसा आत्मविश्वास” तो है, लेकिन उसका “दिल अत्यंत अनैतिकता से भरा हुआ” प्रतीत होता है। यह टिप्पणी देश में तेजी से बढ़ रहे निवेश घोटालों पर न्यायपालिका की गंभीर चिंता को भी दर्शाती है।

मामले की सुनवाई कर रही खंडपीठ ने आरोपी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को निरस्त करने की मांग की थी। यह FIR भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं, विशेष रूप से धोखाधड़ी से संबंधित प्रावधानों के तहत दर्ज की गई थी, साथ ही अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत भी आरोप लगाए गए हैं।

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प्राथमिकी के अनुसार, शिकायतकर्ता को वर्ष 2022 में मिर्जापुर के एक होटल में आरोपी से मिलवाया गया था। आरोपी ने खुद को एक ऐसी कंपनी से जुड़ा बताया जो म्यूचुअल फंड में निवेश करती है और बेहद ऊंचे तथा सुरक्षित रिटर्न देने का दावा करती है। शिकायतकर्ता को यह भरोसा दिलाया गया कि निवेश पूरी तरह सुरक्षित है, 100 प्रतिशत तक मुनाफा संभव है और जरूरत पड़ने पर पैसा कभी भी वापस लिया जा सकता है।

इन आश्वासनों पर भरोसा करते हुए शिकायतकर्ता ने शुरुआती तौर पर ₹42 लाख निवेश कर दिए। शुरुआती चरण में आरोपी ने कुछ रिटर्न भी दिए, जिससे निवेश की विश्वसनीयता और बढ़ गई। हालांकि, कुछ समय बाद भुगतान अचानक बंद हो गया। जब शिकायतकर्ता ने अपना पैसा वापस मांगा, तो आरोपी ने कथित तौर पर कहा कि रकम को क्रिप्टोकरेंसी में निवेश कर दिया गया है और जल्द ही चार गुना मुनाफा मिलेगा।

इसके बाद आरोपी और उससे जुड़े अन्य लोग अचानक संपर्क से बाहर हो गए। उनके फोन बंद हो गए और वेबसाइट भी गायब हो गई, जिससे धोखाधड़ी की आशंका और पुख्ता हो गई।

सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने दलील दी कि यह मामला एक व्यावसायिक लेन-देन का है, जिसमें निवेश जोखिम शामिल होता है और इसे आपराधिक धोखाधड़ी नहीं माना जाना चाहिए। वहीं शिकायतकर्ता पक्ष ने तर्क दिया कि यह निवेश झूठे वादों और भ्रामक जानकारी के आधार पर लिया गया, जो स्पष्ट रूप से आपराधिक कृत्य है और कई लोगों को प्रभावित कर सकता है।

अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि मामले में प्रथमदृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं, जिससे जांच जारी रहनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी का पूर्व में भी धोखाधड़ी से संबंधित आपराधिक इतिहास रहा है, जो उसके आचरण के पैटर्न को दर्शाता है।

अपने आदेश में अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी निवेशकों को “बड़े-बड़े सपने” दिखाते हैं और डिजिटल माध्यमों के जरिए उनसे संपर्क बनाए रखते हैं। लेकिन जैसे ही धोखाधड़ी पूरी हो जाती है, वे “उतनी ही तेजी से गायब हो जाते हैं जितनी तेजी से सामने आए थे।”

कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अगर ऐसे अपराधों पर सख्ती नहीं बरती गई, तो ये समाज में “महामारी” का रूप ले सकते हैं और कई परिवारों को आर्थिक रूप से बर्बाद कर सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल सिविल विवाद नहीं है, बल्कि इसमें आपराधिक मंशा और धोखाधड़ी के स्पष्ट तत्व मौजूद हैं।

इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी और जांच को जारी रखने की अनुमति दी। यह फैसला निवेश धोखाधड़ी के मामलों में एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जहां आरोपी अक्सर खुद को वैध कारोबारी बताकर अपराध को छिपाने की कोशिश करते हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा और निवेशकों को लुभाने वाले फर्जी स्कीम्स पर रोक लगाने में मदद करेगा। फिलहाल मामले की जांच जारी है और आने वाले समय में और तथ्य सामने आने की संभावना है।

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