नई दिल्ली। देश के टैक्स सिस्टम को झकझोर देने वाला एक विशाल GST घोटाला सामने आया है, जिसमें आरोपियों ने फर्जी इनवॉइस, शेल कंपनियों और नकली निर्यात के जरिए लगभग ₹1,800 करोड़ के इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) रिफंड का अवैध लाभ उठाया। जांच एजेंसियों के अनुसार यह अब तक के सबसे जटिल और संगठित GST फ्रॉड में से एक माना जा रहा है, जिसने पूरे सप्लाई चेन सिस्टम को ही अपनी चपेट में ले लिया।
जांच रिपोर्ट में सामने आया है कि इस गिरोह ने शुरुआत से लेकर अंतिम निर्यात चरण तक एक कृत्रिम व्यापार श्रृंखला तैयार की, ताकि हर लेन-देन वास्तविक दिखे और टैक्स रिफंड हासिल किया जा सके। इस पूरे नेटवर्क में दर्जनों कंपनियां शामिल थीं, जो केवल कागजों पर अस्तित्व में थीं और वास्तविक रूप से कोई उत्पादन या व्यापार नहीं कर रही थीं।
फर्जी इनवॉइस से तैयार किया गया पूरा व्यापारिक जाल
घोटाले का मुख्य तरीका फर्जी बिलिंग और नकली खरीद-बिक्री के जरिए ITC क्लेम करना था। आरोपियों ने ऐसे उत्पादों को चुना जिन पर टैक्स दर अधिक थी, ताकि रिफंड का मूल्य भी ज्यादा हो सके। इन वस्तुओं में तंबाकू आधारित उत्पादों को प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया गया।
जांच में सामने आया कि किसी भी वास्तविक उत्पादन सुविधा का उपयोग नहीं किया गया, बल्कि केवल कागजों पर खरीद और बिक्री दिखाई गई। कई मामलों में सस्ती और निम्न गुणवत्ता वाली वस्तुओं को भी अत्यधिक मूल्यवान दिखाकर रिकॉर्ड में दर्ज किया गया, जिससे टैक्स क्रेडिट बढ़ाया जा सके।
शेल कंपनियों और बेनामी निदेशकों का नेटवर्क
इस पूरे फ्रॉड में कई ‘शेल कंपनियों’ का इस्तेमाल किया गया, जिनके पास न तो कर्मचारी थे और न ही कोई वास्तविक व्यापारिक गतिविधि। इन कंपनियों को ऐसे व्यक्तियों के नाम पर रजिस्टर्ड किया गया, जिन्हें केवल कागजी निदेशक के रूप में इस्तेमाल किया गया।
इन लोगों को नकद भुगतान देकर केवल दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराने का काम किया जाता था। वास्तविक संचालन, GST रजिस्ट्रेशन, बैंकिंग और रिटर्न फाइलिंग का पूरा नियंत्रण मास्टरमाइंड गिरोह के पास था। इस तरह एक पूरी परतदार संरचना बनाई गई, जिससे असली मालिकों तक पहुंचना बेहद कठिन हो गया।
E-Way बिल और ट्रांसपोर्ट दस्तावेजों में भी हेरफेर
जांच में यह भी सामने आया कि माल के ट्रांसपोर्ट के लिए बनाए गए e-way बिलों में भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई। कई मामलों में एक ही वाहन नंबर का बार-बार उपयोग किया गया, जबकि कई ट्रांसपोर्ट दस्तावेज पूरी तरह फर्जी पाए गए।
इस तकनीक ने सिस्टम को यह भ्रम दिया कि माल वास्तव में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहा है, जबकि असल में ऐसा कोई माल मौजूद ही नहीं था।
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नकली निर्यात के जरिए बड़े पैमाने पर रिफंड क्लेम
घोटाले का सबसे बड़ा हिस्सा निर्यात के नाम पर किया गया फर्जीवाड़ा था। कई कंपनियों को एक्सपोर्टर दिखाकर महंगे उत्पादों की शिपमेंट रिकॉर्ड में दर्ज की गई, जबकि असल में या तो माल मौजूद नहीं था या उसकी कीमत कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई थी।
इन फर्जी निर्यातों के जरिए भारी मात्रा में टैक्स रिफंड लिया गया। कुछ मामलों में कांडला स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन जैसे क्षेत्रों का उपयोग दिखावटी व्यापार के लिए किया गया।
बैंकिंग ट्रांजैक्शन और मनी फ्लो में भी संदिग्ध गतिविधियां
जांच में पाया गया कि इन कंपनियों के बैंक खातों में वास्तविक व्यापारिक लेन-देन बेहद कम था। अक्सर फंड एक ही नेटवर्क के भीतर घूमता रहा, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह केवल कागजी कारोबार था।
कई खातों में न तो सप्लायर को भुगतान हुआ और न ही लॉजिस्टिक्स या अन्य खर्चों का कोई प्रमाण मिला, जिससे मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका और मजबूत हुई।
एक केंद्रीकृत गिरोह द्वारा नियंत्रित पूरा नेटवर्क
एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क का संचालन एक केंद्रीकृत समूह द्वारा किया जा रहा था। कई कंपनियों के समान संपर्क नंबर, IP एड्रेस और अकाउंटिंग स्टाफ पाए गए, जो एक ही नियंत्रण प्रणाली की ओर इशारा करते हैं।
जांच में यह भी सामने आया कि इसी मास्टरमाइंड के खिलाफ पहले भी वित्तीय अनियमितताओं और फर्जी दस्तावेजों के मामलों में कार्रवाई हो चुकी है।
जांच जारी, बड़े नेटवर्क का खुलासा संभव
वर्तमान में जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलने में जुटी हैं। माना जा रहा है कि इस घोटाले में और भी कई कंपनियां और व्यक्ति शामिल हो सकते हैं। मामले की गहराई को देखते हुए इसे एक संगठित आर्थिक अपराध के रूप में देखा जा रहा है।
यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि तकनीकी रूप से मजबूत टैक्स सिस्टम भी अगर निगरानी कमजोर हो तो बड़े पैमाने पर दुरुपयोग का शिकार हो सकता है।
