बेंगलुरु। कर्नाटक हाईकोर्ट में दायर उस याचिका की सुनवाई के दौरान दिलचस्प कानूनी बहस देखने को मिली, जिसमें श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश ने अपने खिलाफ प्रकाशित कुछ ऑनलाइन लेख हटाने की मांग की है। सुनवाई के दौरान Google और केंद्र सरकार की ओर से यह सवाल उठाया गया कि क्या इस मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र लागू होता है।
याचिका श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस ए.एच.एम.डी. नवाज़ की ओर से दायर की गई है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया है कि उनके खिलाफ इंटरनेट पर उपलब्ध कथित रूप से मानहानिकारक सामग्री को हटाने के निर्देश दिए जाएं। साथ ही ऐसी सामग्री के लिंक या सर्च परिणामों पर भी रोक लगाने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान Google की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत के सामने यह तर्क रखा कि इस याचिका की मेंटेनेबिलिटी ही संदेह के घेरे में है। उनका कहना था कि याचिकाकर्ता श्रीलंका के न्यायाधीश हैं, जिनसे जुड़ी सामग्री भी मूल रूप से श्रीलंका से ही प्रसारित हुई है, जबकि Google एक अमेरिकी कंपनी है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि इस मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार कैसे लागू किया जा सकता है।
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Google की ओर से यह भी कहा गया कि यदि इस तरह की याचिकाओं को स्वीकार कर लिया जाता है, तो दुनिया भर के लोग किसी भी अदालत में इसी प्रकार के मामलों को लेकर पहुंच सकते हैं, जिससे न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ बढ़ सकता है।
केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से पेश अधिवक्ता ने भी इसी तरह की आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अब तक यह संतोषजनक रूप से स्पष्ट नहीं कर पाए हैं कि यह याचिका कर्नाटक हाईकोर्ट में सुनवाई के योग्य कैसे है।
इसके जवाब में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि संविधान का अनुच्छेद 14 नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों पर समान रूप से लागू होता है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री इंटरनेट पर प्रसारित हो रही है, तो उसे हटाने की मांग करना उसका अधिकार है।
याचिकाकर्ता के वकील ने यह भी तर्क दिया कि किसी भी देश के न्यायाधीश को मानहानिकारक सामग्री के जरिए डराने या बदनाम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उनका कहना था कि Google एक इंटरमीडियरी के रूप में उस सामग्री के प्रसार में भूमिका निभा रहा है, जो भारत समेत अन्य देशों में भी देखी जा सकती है। ऐसे में शिकायत मिलने के बाद यदि वह सामग्री नहीं हटाई जाती, तो प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी बनती है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत का ध्यान उन सोशल मीडिया पोस्ट की ओर भी दिलाने की कोशिश की, जिन्हें कथित रूप से उस पत्रकार द्वारा प्रकाशित किया गया था, जिसने संबंधित लेख लिखे थे। उनका कहना था कि जब मामला अदालत में लंबित है, तब इस तरह की टिप्पणियां न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आ सकती हैं।
वकील ने यह भी बताया कि जिन पत्रकारों ने कथित रूप से मानहानिकारक सामग्री प्रकाशित की थी, वे अब श्रीलंका से बाहर अन्य देशों में रह रहे हैं।
एकल पीठ में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सचिन शंकर मगदुम ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए स्थगित कर दिया। साथ ही याचिकाकर्ता के वकील को निर्देश दिया कि Google को भेजे जाने वाले समन के पते में की गई तकनीकी त्रुटियों को ठीक किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि पक्षकारों की सूची में Google India को दूसरे प्रतिवादी के रूप में शामिल किए जाने को हटाया जाए।
अदालत ने मामले की अगली प्रारंभिक सुनवाई 6 अप्रैल 2026 को तय की है।
गौरतलब है कि इससे पहले 5 मार्च को कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस याचिका पर केंद्र सरकार और Google को नोटिस जारी किया था। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में दावा किया है कि इंटरनेट पर उपलब्ध कुछ सामग्री उनके खिलाफ झूठे और मानहानिकारक आरोप लगाती है। उन्होंने अदालत से आग्रह किया है कि इन लिंक को हटाया जाए और सर्च परिणामों पर भी रोक लगाई जाए।
याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि उन्होंने यह मामला श्रीलंका की अदालतों में इसलिए नहीं उठाया क्योंकि एक मौजूदा न्यायाधीश होने के कारण ऐसा करने से पक्षपात की आशंका पैदा हो सकती थी। ऐसे में उन्होंने भारत में न्यायिक राहत मांगने का रास्ता चुना।
मामले की अगली सुनवाई में अदालत इस बात पर विचार कर सकती है कि क्या इस प्रकार की याचिका भारतीय अदालत में सुनवाई योग्य है और इंटरनेट पर प्रकाशित सामग्री को हटाने के लिए किन परिस्थितियों में निर्देश दिए जा सकते हैं।
