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₹500 करोड़ का ‘VIP नंबर’ घोटाला: फर्जी आरसी ट्रांसफर कर बेचे गए पुराने खास नंबर, बड़ा नेटवर्क उजागर

Team The420
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जयपुर। राजस्थान में वाहनों के पुराने और ‘वीआईपी’ माने जाने वाले नंबरों की अवैध खरीद-फरोख्त से जुड़े एक बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि पुराने सीरीज के खास वाहन नंबरों को हासिल करने के लिए एक संगठित नेटवर्क ने फर्जी तरीके से रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (आरसी) ट्रांसफर कराए और बाद में इन नंबरों को ऊंची कीमत पर बेच दिया। इस पूरे नेटवर्क के जरिए करीब ₹500 करोड़ तक के अवैध लेनदेन का अनुमान लगाया जा रहा है।

जांच से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, इस घोटाले का तरीका बेहद सुनियोजित था। कार मालिकों को पता भी नहीं चलता था और उनके वाहन का आरसी रिकॉर्ड चुपचाप किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर ट्रांसफर कर दिया जाता था। इसके बाद पुराने और आकर्षक नंबरों को बाजार में भारी रकम लेकर बेच दिया जाता था।

एजेंट के जरिए शुरू होता था खेल

मामले से जुड़ी एक घटना ने इस पूरे नेटवर्क की परतें खोल दीं। जयपुर के एक कार मालिक ने अपने वाहन का रजिस्ट्रेशन नवीनीकरण कराने के लिए एक एजेंट को दस्तावेज दिए थे। यह सामान्य प्रक्रिया थी, क्योंकि कई वाहन मालिक आरसी अपडेट या नवीनीकरण के लिए एजेंटों की मदद लेते हैं।

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कुछ समय बाद जब उन्हें नया आरसी मिला तो वह हैरान रह गए। दस्तावेज में वाहन का मालिकाना हक उनके नाम से हटाकर किसी अन्य व्यक्ति के नाम कर दिया गया था। जांच में सामने आया कि यह बदलाव उनकी जानकारी या अनुमति के बिना किया गया था।

पुराने नंबरों की भारी मांग

दरअसल, राजस्थान में पुराने वाहन नंबर — खासकर तीन अक्षर और चार अंकों वाले — बेहद लोकप्रिय माने जाते हैं। यह नंबर उस दौर के हैं जब राज्य में नई नंबरिंग प्रणाली लागू नहीं हुई थी। कई लोग इन्हें प्रतिष्ठा का प्रतीक मानते हैं और ऐसे नंबरों के लिए लाखों रुपये तक खर्च करने को तैयार रहते हैं।

जांच में सामने आया कि इसी मांग का फायदा उठाकर एक पूरा नेटवर्क तैयार किया गया। इस नेटवर्क में दलालों, दस्तावेज तैयार करने वालों और सिस्टम की जानकारी रखने वाले लोगों की भूमिका बताई जा रही है। ये लोग पहले ऐसे वाहनों को निशाना बनाते थे जिनके मालिक लंबे समय से आरसी अपडेट या ट्रांसफर जैसी प्रक्रियाओं में एजेंटों की मदद लेते थे।

फर्जी दस्तावेजों से होता था आरसी ट्रांसफर

जांच में यह भी सामने आया है कि कई मामलों में फर्जी हस्ताक्षर और नकली दस्तावेजों का इस्तेमाल कर आरसी ट्रांसफर कर दिए जाते थे। रिकॉर्ड में बदलाव होने के बाद असली मालिक को इसकी जानकारी तक नहीं होती थी।

इसके बाद पुराने वीआईपी नंबरों को अलग कर उन्हें नए खरीदारों को बेच दिया जाता था। कई मामलों में इन नंबरों की कीमत लाखों रुपये तक पहुंच जाती थी, जबकि कुछ खास नंबरों के लिए इससे भी ज्यादा रकम ली जाती थी।

राज्यभर में फैला नेटवर्क

सूत्रों के अनुसार यह नेटवर्क सिर्फ जयपुर तक सीमित नहीं था। प्रारंभिक जांच से संकेत मिले हैं कि राज्य के अन्य शहरों में भी इसी तरह की गतिविधियां हो सकती हैं। अधिकारियों का मानना है कि कई सालों से यह अवैध कारोबार चुपचाप चल रहा था और इसमें बड़ी संख्या में वाहन नंबरों का लेनदेन हुआ।

जांच में अब उन मामलों की भी पड़ताल की जा रही है जिनमें आरसी रिकॉर्ड में अचानक बदलाव हुए या पुराने नंबर किसी नए वाहन पर दिखाई देने लगे। कई ऐसे मामलों की पहचान की गई है जिनमें मालिकों को बाद में पता चला कि उनके वाहन का रिकॉर्ड बदल चुका है।

वाहन मालिकों को सतर्क रहने की सलाह

मामले के सामने आने के बाद वाहन मालिकों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि आरसी नवीनीकरण या किसी भी दस्तावेजी प्रक्रिया के दौरान वाहन मालिकों को खुद रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए और एजेंटों पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहिए।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि इस तरह के मामलों में अक्सर सिस्टम की प्रक्रियाओं और मानव लापरवाही का फायदा उठाया जाता है। उनके मुताबिक, “जब किसी सरकारी रिकॉर्ड को डिजिटल या अर्ध-डिजिटल प्रक्रिया के जरिए अपडेट किया जाता है, तो उसमें फर्जी दस्तावेज या पहचान का दुरुपयोग कर रिकॉर्ड में बदलाव करने की कोशिश की जाती है। ऐसे मामलों में सत्यापन की कई परतें मजबूत करना बेहद जरूरी है।”

जांच एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ने में जुटी हैं। अधिकारियों का मानना है कि जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, इस घोटाले में शामिल और लोगों तथा अवैध लेनदेन के नए मामलों का खुलासा हो सकता है।

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