मथुरा। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में 78 लाख रुपये के कथित घोटाले में फंसे कनिष्ठ लिपिक का पुराना मामला सामने आने के बाद विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि लिपिक ने वर्ष 2021 में एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के सामान्य भविष्य निधि (जीपीएफ) के 12 लाख रुपये फर्जी तरीके से अपनी पत्नी के बैंक खाते में ट्रांसफर कर दिए थे। जांच में दोषी पाए जाने के बाद उसकी सेवा समाप्त करने की संस्तुति की गई थी, लेकिन माफी मांगने पर उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं हुई। अब 24 कर्मचारियों के वेतन और भत्तों के नाम पर 78 लाख रुपये के कथित घोटाले का खुलासा होने के बाद से आरोपी लिपिक कार्यालय से गायब है।
ताजा मामला पीडब्ल्यूडी के प्रांतीय खंड के स्थापना पटल का है। यहां वित्तीय वर्ष 2020-21 और 2021-22 के रिकॉर्ड के ऑडिट के दौरान 24 कर्मचारियों के वेतन और भत्तों के नाम पर 78 लाख रुपये के अतिरिक्त भुगतान का पता चला। जांच में सामने आया कि संबंधित कर्मचारियों ने अतिरिक्त भुगतान के लिए कोई आवेदन नहीं किया था। इसके बावजूद उनके खातों में सरकारी धन भेजा गया। आरोप है कि बाद में कर्मचारियों से यह रकम वापस लेकर अपने पास रख ली गई।
पटल प्रभारी की आईडी और पासवर्ड का दुरुपयोग
प्रारंभिक जांच के अनुसार, वर्ष 2019 से स्थापना पटल पर सहायक के रूप में तैनात कनिष्ठ लिपिक ने कथित तौर पर पटल प्रभारी की आईडी और पासवर्ड का दुरुपयोग कर अतिरिक्त भुगतान कराया। कर्मचारियों के खातों में रकम पहुंचने के बाद उसने नौकरी जाने और अपनी गलती का हवाला देकर उनसे पैसे वापस मांगे। आरोप है कि कुछ रकम नकद और कुछ ऑनलाइन माध्यम से वापस ली गई।
एक मेट ने बताया कि उसने लिपिक के कहने पर अतिरिक्त भुगतान की रकम ऑनलाइन उसके खाते में वापस भेजी थी। इस जानकारी के बाद जांच में कर्मचारियों के बैंक खातों और रकम की वापसी से जुड़े लेनदेन की पड़ताल महत्वपूर्ण हो गई है। जांच अधिकारी यह पता लगाने में जुटे हैं कि 24 कर्मचारियों के खातों में अलग-अलग कितनी रकम भेजी गई और उसमें से कितनी राशि आरोपी तक पहुंची।
मामले में यह भी जांच का विषय है कि सरकारी धन का अतिरिक्त भुगतान किस प्रक्रिया के तहत किया गया और कर्मचारियों से रकम वापस लेने का आधार क्या था। विभागीय रिकॉर्ड, भुगतान संबंधी दस्तावेजों और बैंक खातों के लेनदेन का मिलान कर पूरे मामले की कड़ियां जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
सेवानिवृत्त पटल प्रभारी ने खुद को बताया निर्दोष
स्थापना पटल के प्रभारी पिछले महीने सेवानिवृत्त हो चुके हैं। घोटाले की जानकारी सामने आने के बाद वह कार्यालय पहुंचे और खुद को निर्दोष बताया। हालांकि, मामले में भुगतान प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर जांच की जा रही है। अभी यह स्पष्ट होना बाकी है कि कथित अनियमित भुगतान किस स्तर पर किए गए और संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी थी या नहीं।
घोटाले का खुलासा होने के बाद से आरोपी कनिष्ठ लिपिक कार्यालय नहीं आ रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अधिशासी अभियंता गुलवीर सिंह ने उसे व्हाट्सएप के माध्यम से नोटिस भेजा है। नोटिस में सभी 24 कर्मचारियों के बैंक स्टेटमेंट के साथ आरोपी से अपने बैंक खातों का विवरण भी प्रस्तुत करने को कहा गया है। इन दस्तावेजों से अतिरिक्त भुगतान और उसके बाद हुए लेनदेन की जानकारी जुटाई जाएगी।
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2021 में सेवानिवृत्त कर्मचारी के जीपीएफ से ट्रांसफर किए थे 12 लाख
कनिष्ठ लिपिक पर इससे पहले भी सरकारी कर्मचारी की बचत राशि में हेराफेरी का मामला सामने आया था। 13 सितंबर 2021 को उसने कथित तौर पर सेवानिवृत्त वाहन चालक दयाशंकर के जीपीएफ के 12 लाख रुपये फर्जी तरीके से अपनी पत्नी के बैंक खाते में ट्रांसफर कर दिए थे। मामला उजागर होने के बाद निर्माण खंड-1 के तत्कालीन अधिशासी अभियंता ने जांच कराई थी।
जांच में लिपिक को दोषी पाया गया था। इसके बाद उसकी पत्नी के खाते से पूरी रकम वापस कराई गई और उसकी सेवा समाप्त करने की संस्तुति भी भेजी गई थी। हालांकि, लिपिक के माफी मांगने पर अधिकारियों ने नरमी बरती और प्रस्तावित कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी। अब नए मामले में 78 लाख रुपये के कथित घोटाले का खुलासा होने के बाद पुराने प्रकरण में की गई कार्रवाई भी चर्चा में है।
जांच के बाद होगी सख्त कार्रवाई
मुख्य अभियंता एनके यादव ने बताया कि स्थापना पटल के ऑडिट के दौरान 78 लाख रुपये के घपले का मामला सामने आया है। इसकी गहन जांच कराई जा रही है। जांच में दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल जांच में 24 कर्मचारियों के खातों में हुए अतिरिक्त भुगतान, रकम की वापसी, बैंक लेनदेन और पटल की लॉगिन आईडी के कथित दुरुपयोग पर ध्यान दिया जा रहा है। बैंक स्टेटमेंट और विभागीय रिकॉर्ड के मिलान से यह पता लगाने की कोशिश होगी कि सरकारी धन किस प्रक्रिया से खातों में पहुंचा और बाद में कहां गया। जांच के निष्कर्षों के आधार पर संबंधित लोगों की जिम्मेदारी तय कर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
