नई दिल्ली: दिल्ली की विशेष अदालत ने शुक्रवार (27 मार्च, 2026) को कोल ब्लॉक आवंटन से जुड़े मामले में पूर्व सांसद विजय दारड़ा, उनके बेटे देवेन्द्र दारड़ा और पूर्व कोल सचिव H.C. गुप्ता को बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं थे।
इस फैसले के साथ ही एक दशक से लंबित यह हाई‑प्रोफाइल कानूनी लड़ाई समाप्त हो गई। अदालत ने मनोज कुमार जयसवाल और M/s AMR Iron and Steel Private Limited को भी बरी किया। मामला उस पहले चार्जशीट से जुड़ा था, जिसे केंद्रीय जांच एजेंसी ने महाराष्ट्र के बांदरे में कोल ब्लॉक आवंटन के सिलसिले में दायर किया था।
प्रॉसिक्यूशन का दावा था कि AMR Iron and Steel Private Limited ने H.C. गुप्ता के साथ मिलकर अपने आवेदन में झूठी जानकारी दी थी, ताकि उन्हें कोल ब्लॉक आवंटित किया जा सके। आरोप था कि विजय दारड़ा, जो उस समय महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद थे, ने प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर इस कंपनी को कोल ब्लॉक आवंटित करने की सिफारिश की।
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हालांकि, अदालत ने केंद्रीय जांच एजेंसी के आरोपों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि आवंटन प्रक्रिया के दौरान सभी आवश्यक जानकारी पहले ही अधिकारियों के पास मौजूद थी और किसी गवाह ने यह साबित नहीं किया कि किसी प्रकार का प्रलोभन या धोखाधड़ी की गई।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि प्रॉसिक्यूशन ने धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोप साबित नहीं किए। साक्ष्यों और गवाहों के बयान की गहन जांच के बाद अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि कंपनी के आवेदन या फीडबैक फॉर्म में कोई गलत या बेईमान इरादा नहीं था।
कथित ₹24.6 करोड़ के लेन‑देन को लेकर भी कोई ठोस सबूत नहीं मिले। अदालत ने कहा कि इन भुगतानों और कोल ब्लॉक आवंटन या विजय दारड़ा द्वारा लिखे गए पत्रों के बीच कोई संबंध स्थापित नहीं हुआ। साथ ही यह साबित नहीं हुआ कि पत्रों का आवंटन निर्णय पर कोई असर पड़ा।
विशेष CBI जज सुनेना शर्मा ने कहा, “साक्ष्यों और गवाहियों की गहन जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि आरोपों को समर्थन देने के लिए कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं हैं।” अदालत का विस्तृत निर्णय अभी जारी होना है।
यह मामला उस समय सुर्खियों में आया था जब केंद्रीय जांच एजेंसी ने कोल ब्लॉक आवंटन से जुड़े 50 से अधिक मामले दर्ज किए थे। इसके पीछे कथित भ्रष्टाचार और ब्लॉक आवंटन में अनियमितताओं के आरोप थे।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला उन मामलों का उदाहरण पेश करता है जहां लंबी कानूनी लड़ाइयों और जांच के बावजूद साक्ष्यों की कमी के कारण उच्च‑स्तरीय व्यक्तियों को बरी किया गया। न्यायिक प्रक्रिया ने यह साबित किया कि केवल आरोप लगाने से कोई दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
फैसले के बाद राजनेताओं और उद्योगपतियों में राहत की लहर देखी गई। अदालत ने निष्पक्ष और तथ्यात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय सुनाया।
इस निर्णय से यह भी स्पष्ट हुआ कि उच्च‑स्तरीय मामलों में न्यायपालिका की निष्पक्षता और प्रक्रियागत जांच कितनी महत्वपूर्ण होती है। लंबे समय तक चली जांच और अदालत की सुनवाई के बावजूद, अदालत ने केवल प्रमाण आधारित निष्कर्ष को महत्व दिया।
