वाराणसी। साइबर ठगों के खिलाफ कार्रवाई के बावजूद ऑनलाइन धोखाधड़ी का नेटवर्क लगातार नए मोबाइल नंबरों और नए तरीकों के साथ सक्रिय है। वाराणसी में साइबर अपराध की जांच के दौरान सामने आया है कि ठग रोजाना औसतन 30 लोगों को फोन कर ठगी या ठगी का प्रयास करते हैं। साइबर टीम ने पिछले एक साल में ऐसे करीब 10 हजार मोबाइल नंबर चिह्नित किए, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर साइबर अपराध या लोगों से संपर्क कर ठगी के प्रयास में किया गया। जांच के बाद इन नंबरों को बंद कराया गया, लेकिन इसके बावजूद साइबर ठग नए नंबरों के जरिए लोगों को निशाना बना रहे हैं।
पुलिस के अनुसार, चिह्नित किए गए कई नंबरों से लोगों को 20 से 25 बार तक कॉल किए जाने की जानकारी मिली। ठग केवल सामान्य फोन कॉल के जरिए ही लोगों को निशाना नहीं बना रहे, बल्कि OTP हासिल करने के लिए करीब 15 अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमें टेलीकॉम कंपनियों के कोड नंबर डायल करवाना, कॉल फॉरवर्डिंग सक्रिय कराना, मालवेयर भेजना, फिशिंग वेबसाइट और संदिग्ध लिंक का इस्तेमाल तथा SIM स्वैपिंग जैसे तरीके शामिल हैं।
साइबर ठगों के तौर-तरीकों में लगातार बदलाव पुलिस के लिए चुनौती बना हुआ है। कुछ मामलों में ठग पहले से उपलब्ध व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल कर पीड़ित का भरोसा जीतने की कोशिश करते हैं। डार्कवेब पर लीक हुए डेटा समेत अन्य स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर वे खुद को बैंक कर्मचारी, परिचित, कंपनी प्रतिनिधि या किसी अन्य विश्वसनीय व्यक्ति के तौर पर पेश कर सकते हैं। इसके बाद OTP या अन्य गोपनीय जानकारी हासिल करने की कोशिश की जाती है।
जांच में सामने आया है कि ठगों का नेटवर्क केवल फोन कॉल तक सीमित नहीं है। कई मामलों में पीड़ित को पहले कॉल किया जाता है और फिर उसे किसी लिंक पर क्लिक करने, वेबसाइट खोलने, एप्लिकेशन डाउनलोड करने या मोबाइल में कोई विशेष कोड डालने के लिए कहा जाता है। कुछ मामलों में कॉल फॉरवर्डिंग शुरू कराने या SIM से जुड़ी सेवाओं में बदलाव कराने की कोशिश की जाती है। इसके बाद बैंकिंग या अन्य डिजिटल खातों तक पहुंच बनाने का प्रयास किया जाता है।
साइबर ठगी की रकम के लिए म्यूल बैंक खातों का इस्तेमाल भी जांच का अहम हिस्सा बना हुआ है। अलग-अलग राज्यों में बैठे पीड़ितों से कथित तौर पर ठगी करने के बाद रकम सीधे मुख्य आरोपियों के खातों में नहीं भेजी जाती। इसके बजाय दूसरे लोगों के बैंक खातों का इस्तेमाल किया जाता है। पुलिस के अनुसार, ऐसे खाते कथित तौर पर कमीशन के लालच में उपलब्ध कराए जाते हैं। रकम पहुंचने के बाद उसे कई दूसरे खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता है या अलग-अलग माध्यमों से निकाल लिया जाता है।
इस तरह रकम को कई स्तरों पर घुमाने से उसके वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थी तक पहुंचना जांच एजेंसियों के लिए मुश्किल हो जाता है। वाराणसी से जुड़े मामलों में राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर करीब 17 हजार शिकायतें दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इन शिकायतों के आधार पर औसतन रोजाना करीब 23 मामले बैंकों की जांच और कार्रवाई तक पहुंचे। पुलिस अब इन मामलों में इस्तेमाल हुए खातों, मोबाइल नंबरों और डिजिटल लेनदेन की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है।
जांच में यह भी सामने आया है कि साइबर ठगी का नेटवर्क वाराणसी तक सीमित नहीं है। पुलिस, साइबर सेल और साइबर थाने की पड़ताल में राजस्थान के अलवर, महाराष्ट्र के नासिक, चंडीगढ़, बंगाल सीमा क्षेत्र और ओडिशा के पिछड़े जिलों से जुड़े लेनदेन की कड़ियां मिली हैं। म्यूल खातों में पहुंची रकम के लेनदेन की जांच के दौरान इन इलाकों से जुड़े बैंक खाते और मोबाइल नंबर सामने आए हैं। अब यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इन खातों को किसने उपलब्ध कराया और रकम को आगे भेजने में किन लोगों की भूमिका रही।
Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise
जांच एजेंसियां संदिग्ध बैंक खातों के लेनदेन का पैटर्न भी देख रही हैं। रकम किस खाते में आई, कितनी देर बाद दूसरे खाते में भेजी गई और उसके बाद नकद निकासी या अन्य डिजिटल माध्यम से उसका क्या हुआ, इसकी जानकारी जुटाई जा रही है। पुलिस को आशंका है कि रकम को अलग-अलग खातों में भेजकर मूल स्रोत और कथित ठगों की पहचान छिपाने की कोशिश की गई।
साइबर ठगी से जुड़े अलग-अलग मामलों में पुलिस ने करीब ₹25 करोड़ की रकम होल्ड कराई है। हालांकि, होल्ड की गई रकम तुरंत पीड़ितों के खाते में वापस नहीं आती। इसके लिए बैंकिंग और कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होती है। पुलिस के मुताबिक, अब तक करीब ₹4.50 करोड़ की रकम पीड़ितों को वापस दिलाई जा चुकी है। बाकी रकम की वापसी के लिए संबंधित मामलों में प्रक्रिया जारी है।
साइबर सेल की जांच में ठगी के प्रयासों को भी गंभीरता से लिया जा रहा है। पुलिस का कहना है कि किसी व्यक्ति से ठगी की रकम जाने के बाद कार्रवाई शुरू करने के बजाय संदिग्ध कॉल या संदेश की जानकारी समय पर मिलने से संभावित नुकसान को रोका जा सकता है। इसी वजह से बंद कराए गए मोबाइल नंबरों और उनसे जुड़े बैंक खातों की जानकारी का विश्लेषण लगातार किया जा रहा है।
पुलिस के अनुसार, OTP, बैंकिंग विवरण और मोबाइल से जुड़े सुरक्षा कोड बेहद संवेदनशील जानकारी हैं। अनजान व्यक्ति के कहने पर कोई कोड डायल करना, कॉल फॉरवर्डिंग सक्रिय करना, संदिग्ध लिंक खोलना या अनजान एप्लिकेशन इंस्टॉल करना जोखिम बढ़ा सकता है। किसी भी संदिग्ध कॉल पर जल्दबाजी में जानकारी साझा करने के बजाय बातचीत रोकना जरूरी है। साइबर ठगी होने या प्रयास की स्थिति में तत्काल शिकायत करने से रकम को संबंधित खातों में होल्ड कराने और नुकसान कम करने की संभावना बढ़ती है।
