नई दिल्ली: यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने को लेकर जारी बहस के बीच पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) ने एक टिकाऊ राजस्व मॉडल की आवश्यकता पर जोर दिया है। उद्योग संगठन का कहना है कि UPI जैसे विशाल डिजिटल भुगतान नेटवर्क को सुरक्षित, विश्वसनीय और भविष्य के लिए सक्षम बनाए रखने के लिए साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकथाम, तकनीकी अवसंरचना और नवाचार में लगातार निवेश आवश्यक है। परिषद ने स्पष्ट किया कि उसकी मांग का उद्देश्य उपभोक्ताओं या छोटे व्यापारियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालना नहीं, बल्कि भुगतान प्रणाली के दीर्घकालिक संचालन को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना है।
पीसीआई के अनुसार, देश में डिजिटल भुगतान का विस्तार अभूतपूर्व गति से हुआ है और UPI अब भारत के कुल डिजिटल भुगतान लेनदेन का लगभग 89 प्रतिशत हिस्सा संभाल रहा है। प्लेटफॉर्म पर हर महीने 23 अरब से अधिक लेनदेन होते हैं, जिनका कुल मूल्य लगभग ₹30 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है। इतने बड़े नेटवर्क के संचालन के लिए अत्याधुनिक तकनीक, साइबर सुरक्षा उपाय, नियामकीय अनुपालन, ग्राहक सहायता, फ्रॉड मॉनिटरिंग और निरंतर नवाचार पर भारी निवेश की आवश्यकता होती है, जिसका अधिकांश खर्च वर्तमान में बैंक और भुगतान सेवा प्रदाता वहन कर रहे हैं।
मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह शुल्क है जो व्यापारी डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता को देते हैं। वर्ष 2020 से UPI लेनदेन पर शून्य MDR व्यवस्था लागू है। हालांकि हाल ही में लोकसभा ने भुगतान प्रणाली से जुड़े कानून में संशोधन पारित किया है, जिसके बाद सरकार को अधिसूचित डिजिटल भुगतान माध्यमों, जिनमें UPI भी शामिल है, पर आवश्यकता पड़ने पर MDR लागू करने का अधिकार मिल गया है। फिलहाल सरकार ने उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों पर किसी भी प्रकार का तत्काल शुल्क लगाने से इनकार किया है।
पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया का कहना है कि पिछले लगभग एक दशक में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI), बैंक, फिनटेक कंपनियों और भुगतान सेवा प्रदाताओं ने मिलकर दुनिया की सबसे बड़ी रियल-टाइम डिजिटल भुगतान प्रणाली विकसित की है। इस दौरान साइबर सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने, धोखाधड़ी की पहचान और रोकथाम के लिए उन्नत तकनीकों को अपनाने तथा भुगतान प्रणाली को अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने में लगातार निवेश किया गया है। परिषद का मानना है कि बढ़ते डिजिटल लेनदेन के साथ इन निवेशों को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
यह मुद्दा राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। हाल के दिनों में विपक्ष ने आशंका जताई थी कि यदि MDR लागू किया गया तो इसका अतिरिक्त बोझ अंततः आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। इसके जवाब में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों के लिए UPI भुगतान पहले की तरह निःशुल्क ही रहेगा। उन्होंने कहा कि जहां कहीं मर्चेंट सर्विस चार्ज लागू होता है, वह व्यापारी और भुगतान सेवा प्रदाता के बीच का व्यावसायिक समझौता होता है, न कि उपभोक्ता से वसूला जाने वाला शुल्क।
डिजिटल भुगतान उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर हमलों, फिशिंग, फर्जी UPI ऐप, सोशल इंजीनियरिंग और ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों को देखते हुए भुगतान नेटवर्क की सुरक्षा पर लगातार निवेश करना अनिवार्य हो गया है। साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, भारत जैसे विशाल डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र में साइबर सुरक्षा और फ्रॉड प्रिवेंशन पर निरंतर निवेश केवल तकनीकी आवश्यकता नहीं बल्कि वित्तीय स्थिरता और उपभोक्ता विश्वास बनाए रखने की भी अनिवार्य शर्त है। उनका कहना है कि सुरक्षा तंत्र मजबूत होने से डिजिटल भुगतान प्रणाली पर लोगों का भरोसा बढ़ता है और बड़े पैमाने पर होने वाले साइबर वित्तीय अपराधों को प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है।
पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया ने कहा कि UPI अब दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम भुगतान नेटवर्क बन चुका है और इसके विस्तार के साथ अवसंरचना, सुरक्षा तथा नवाचार के लिए स्थायी वित्तीय मॉडल पर गंभीर चर्चा आवश्यक है। परिषद का मानना है कि भविष्य में कोई भी व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों के हित पूरी तरह सुरक्षित रहें, जबकि बैंक, फिनटेक कंपनियां और भुगतान सेवा प्रदाता भी डिजिटल भुगतान प्रणाली को सुरक्षित, मजबूत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए आवश्यक निवेश जारी रख सकें।
