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फर्जी लेटर पैड, कागजों पर ‘ऊर्जीकृत’ नलकूप और ₹1.39 करोड़ का घोटाला: 18 साल बाद तत्कालीन जेई गिरफ्तार

Team The420
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मेरठ। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन की नलकूप विद्युतीकरण योजना में कथित तौर पर हुए ₹1.39 करोड़ के घोटाले में आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन (ईओडब्ल्यू) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए तत्कालीन जूनियर इंजीनियर ब्रिजेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया है। लगभग 18 वर्ष पुराने इस मामले में गिरफ्तारी के बाद बिजली विभाग और प्रशासनिक हलकों में फिर से हलचल तेज हो गई है। जांच एजेंसी का आरोप है कि सरकारी योजना के तहत निर्धारित लक्ष्यों को पूरा किए बिना ही सैकड़ों निजी नलकूपों को कागजों पर ऊर्जीकृत दिखाकर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया।

मामला वर्ष 2006-07 का है, जब उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन की सामान्य योजना के अंतर्गत मुजफ्फरनगर और शामली क्षेत्र में निजी नलकूपों के विद्युतीकरण का कार्य कराया जाना था। योजना का उद्देश्य किसानों को सिंचाई के लिए विद्युत सुविधा उपलब्ध कराना था, लेकिन बाद में सामने आए आरोपों के अनुसार वास्तविक कार्य किए बिना ही कई नलकूपों को बिजली कनेक्शन जारी दिखा दिया गया और संबंधित अभिलेख तैयार कर भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर ली गई।

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जांच में यह भी सामने आया कि करीब 200 निजी नलकूपों को ऊर्जीकृत दर्शाने के लिए कथित रूप से जनप्रतिनिधियों के 200 से अधिक फर्जी लेटर पैड तैयार किए गए थे। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर कनेक्शन स्वीकृत और जारी होने का रिकॉर्ड बनाया गया। आरोप है कि पूरी प्रक्रिया को वैध दिखाने के लिए निरीक्षण रिपोर्टों और अन्य आधिकारिक दस्तावेजों में भी हेरफेर की गई। जब अनियमितताओं की जानकारी सामने आई तो मामले की जांच शुरू कराई गई।

जांच एजेंसियों के अनुसार प्रारंभिक परीक्षण में पता चला कि योजना के वास्तविक क्रियान्वयन और सरकारी रिकॉर्ड में भारी अंतर था। कई मामलों में जिन नलकूपों को कागजों पर बिजली कनेक्शन प्राप्त दिखाया गया, वहां वास्तविक स्थिति अलग पाई गई। इसी आधार पर विस्तृत जांच शुरू हुई और वित्तीय नुकसान का आकलन किया गया। जांच में उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन को लगभग ₹1.39 करोड़ का नुकसान होने की बात सामने आई।

मामले में तत्कालीन जूनियर इंजीनियर ब्रिजेश कुमार की भूमिका विशेष रूप से जांच के दायरे में रही। आरोप है कि उन्होंने कथित रूप से फर्जी निरीक्षण रिपोर्ट तैयार कर कई उपभोक्ताओं को विद्युत कनेक्शन प्राप्त दिखाया और योजना से संबंधित रिकॉर्ड को प्रमाणित किया। जांच के दौरान उपलब्ध दस्तावेजों, अभिलेखों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया। इसके बाद उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

ईओडब्ल्यू अधिकारियों के अनुसार मामले की विवेचना के दौरान अन्य व्यक्तियों की भूमिका भी सामने आई है। जांच एजेंसी ने अभियोजन स्वीकृति प्राप्त करने के बाद कार्रवाई को आगे बढ़ाया और अब पूरे नेटवर्क की भूमिका की जांच की जा रही है। सूत्रों का कहना है कि मामले में शामिल अन्य लोगों के खिलाफ भी आगे कार्रवाई की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

इस प्रकरण में मुजफ्फरनगर कोतवाली में धोखाधड़ी, जालसाजी, कूटरचना और आपराधिक षड्यंत्र सहित भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। लंबे समय तक चली जांच और दस्तावेजी परीक्षण के बाद अब गिरफ्तारी की कार्रवाई हुई है। यह मामला उन पुराने आर्थिक अपराधों में शामिल है जिनमें सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के दौरान कथित अनियमितताओं की परतें वर्षों बाद खुलीं।

वित्तीय और प्रशासनिक मामलों के जानकारों का मानना है कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और तकनीकी निगरानी की कमी होने पर इस प्रकार की अनियमितताओं की संभावना बढ़ जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल सत्यापन, जीआईएस आधारित निगरानी और नियमित ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं ऐसी घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

करीब दो दशक पुराने इस मामले में हुई गिरफ्तारी ने एक बार फिर सरकारी परियोजनाओं में जवाबदेही और निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि कथित घोटाले में किन-किन लोगों की भूमिका थी, सरकारी धन का उपयोग किस प्रकार किया गया और क्या इस मामले में आगे और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।

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