नोएडा: शहर की ग्रुप हाउसिंग परियोजनाओं में फ्लैट खरीदारों की परेशानी और वर्षों से अधूरी पड़ी परियोजनाओं को लेकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने जांच शुरू कर दी है। जांच एजेंसी ने नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों से लगातार चार दिन दिल्ली स्थित अपने कार्यालय में पूछताछ की। इस दौरान परियोजनाओं के आवंटन, नक्शा पास करने की प्रक्रिया और बिल्डरों की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटाई गई। सीबीआई ने कई महत्वपूर्ण फाइलों को भी जांच के लिए अपने कब्जे में लिया है। जांच की शुरुआत सेक्टर-128 स्थित जेपी की क्यूब परियोजना से होने की जानकारी सामने आई है।
सूत्रों के मुताबिक, क्यूब परियोजना से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल के दौरान सीबीआई ने प्राधिकरण के नियोजन विभाग की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया। इसके बाद जांच की कड़ियां अन्य ग्रुप हाउसिंग परियोजनाओं तक पहुंचीं, जहां लंबे समय से फ्लैट खरीदार परेशान हैं। इनमें सेक्टर-79 की द वेलविडर, सेक्टर-131 की द आर्चर्ड और सेक्टर-143 की ब्लूम जेस्ट समेत अन्य परियोजनाएं शामिल हैं। जांच में शामिल अधिकतर परियोजनाएं पुरानी हैं और इनमें कुछ का निर्माण आठ से दस साल बाद भी पूरा नहीं हो पाया है।
सीबीआई ने अधिकारियों से यह जानने की कोशिश की कि परियोजनाओं के नक्शे कब और किन परिस्थितियों में पास किए गए। साथ ही यह भी पूछा गया कि नक्शा पास होने से पहले या उसके बाद बिल्डर को फ्लैट बेचने की अनुमति किस आधार पर मिली। जांच एजेंसी ने तत्कालीन अधिकारियों और नक्शे स्वीकृत करने वाले कर्मचारियों की भूमिका को लेकर भी कई सख्त सवाल किए हैं। अधिकारियों से यह जानकारी भी मांगी गई कि नक्शा पास होने के बाद यदि कोई परियोजना वर्षों तक अधूरी रहती है और बाद में उसी नक्शे के आधार पर निर्माण शुरू किया जाता है तो निर्माण की मजबूती और मानकों का आकलन किस स्तर पर किया जाता है।
बैंक अधिकारियों से भी पूछताछ
सूत्रों के अनुसार, सीबीआई ने प्राधिकरण के अधिकारियों के साथ कुछ बैंक अधिकारियों को भी पूछताछ के लिए बुलाया। उनसे परियोजनाओं के लिए दिए गए बैंक लोन और बिल्डर को जारी की गई रकम से जुड़ी जानकारी मांगी गई। यह भी पूछा गया कि बैंक ने फ्लैट खरीदार के दस्तावेजों की जांच करते समय यह देखा था या नहीं कि खरीदार ने फ्लैट कब बुक किया और संबंधित परियोजना का नक्शा प्राधिकरण ने कब पास किया था। बिल्डर को लोन की रकम किस अनुपात में और किन चरणों में जारी की गई, इस संबंध में भी जानकारी ली गई।
रेरा से पहले की व्यवस्था भी जांच के घेरे में
सीबीआई की जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) के गठन से पहले की व्यवस्था पर केंद्रित बताया जा रहा है। रेरा का गठन 2016 में हुआ और कानून 2017 में प्रभावी हुआ। एजेंसी यह जानने की कोशिश कर रही है कि उस अवधि में प्राधिकरण की जिम्मेदारी केवल जमीन आवंटित करने और नक्शा पास करने तक सीमित थी या निर्माण की निगरानी भी उसकी भूमिका में शामिल थी।
जांच में यह भी पूछा जा रहा है कि यदि किसी बिल्डर ने नियमों की अनदेखी की तो प्राधिकरण ने उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की। सेक्टर-128 की क्यूब परियोजना को लेकर वर्ष 2013 में पास किए गए नक्शे और प्राधिकरण के रिकॉर्ड में जेपी की जमीन को चिन्हित किए जाने की तारीख समेत कई बिंदुओं पर जानकारी मांगी गई है।
सीबीआई की पूछताछ के कारण प्राधिकरण के ग्रुप हाउसिंग और नियोजन विभाग में हलचल है। अधिकारियों को सोमवार को फिर पूछताछ के लिए बुलाए जाने की संभावना जताई जा रही है। नोएडा प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कृष्ण करुणेश ने कहा कि जांच एजेंसी की ओर से मांगी जाने वाली जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। जिन मामलों में अधिकारियों या कर्मचारियों को जानकारी के लिए बुलाया जाता है, संबंधित विभाग के अधिकारी वहां जाकर सहयोग करते हैं।
