लखनऊ (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश में नकली दवाओं का कारोबार मरीजों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) की जांच में खुलासा हुआ है कि नकली दवा बेचने वाले नेटवर्क में भारी मुनाफे का लालच सबसे बड़ा कारण बन रहा है। जांच के दौरान लखनऊ समेत प्रदेश के कई जिलों से करीब ₹20 करोड़ मूल्य की नकली दवाएं बरामद की गई हैं। अधिकारियों के अनुसार, इस अवैध कारोबार में शामिल लोग नामी कंपनियों के ब्रांड और पैकेजिंग का इस्तेमाल कर बाजार में नकली दवाएं पहुंचा रहे थे।
जांच में सामने आया है कि असली दवाओं की बिक्री पर मेडिकल स्टोर संचालकों को सामान्य तौर पर सीमित मार्जिन मिलता है, जबकि नकली दवाओं में कई गुना अधिक लाभ का लालच दिया जाता है। इसी आर्थिक फायदे के कारण कुछ दवा विक्रेता बिना जांच-पड़ताल के ऐसी दवाओं को बाजार में खपा देते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, नकली दवाओं का कारोबार करने वाले गिरोह खुदरा विक्रेताओं को प्रिंट मूल्य से बहुत कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराते हैं, जिससे उन्हें भारी मुनाफा कमाने का अवसर मिलता है।
एफएसडीए की जांच में सामने आए एक मामले में ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने वाली दवा टेल्मा एच की नकली खेप पकड़ी गई। जांच के अनुसार, जिस दवा का प्रिंट मूल्य लगभग ₹380 प्रति पत्ता था, उसे नकली नेटवर्क द्वारा मेडिकल स्टोर संचालकों तक केवल ₹25 से ₹30 में पहुंचाया जा रहा था। वहीं, एक अन्य मामले में बवासीर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा की नकली खेप सामने आई, जिसका बाजार मूल्य लगभग ₹980 प्रति पत्ता था, लेकिन उसे केवल ₹100 के आसपास की कीमत में उपलब्ध कराया जा रहा था।
अधिकारियों का कहना है कि नकली दवाओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनमें सक्रिय औषधीय तत्व या तो बेहद कम मात्रा में होते हैं या पूरी तरह अनुपस्थित होते हैं। जांच में कई नमूनों में बेहद कम रासायनिक तत्व पाए गए। कुछ मामलों में केवल सामान्य पदार्थों को मिलाकर गोलियों का आकार दे दिया गया था। ऐसी दवाएं मरीजों के इलाज में प्रभावी नहीं होतीं और गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकती हैं।
एफएसडीए की टीम ने आगरा, लखनऊ, गोंडा, लखीमपुर खीरी, महराजगंज और गोरखपुर समेत कई जिलों में कार्रवाई कर नकली दवाओं की खेप पकड़ी है। पूछताछ में यह भी सामने आया है कि कुछ नकली दवाएं हरियाणा, राजस्थान और उत्तराखंड से उत्तर प्रदेश में भेजी जा रही थीं। इन दवाओं को सीधे निर्माण स्थलों से गुप्त गोदामों तक पहुंचाया जाता था, जहां से इन्हें छोटे शहरों और कस्बों के मेडिकल स्टोरों तक सप्लाई किया जाता था।
जांच एजेंसियों के अनुसार, नकली दवा नेटवर्क में सप्लाई का तरीका भी अलग है। असली दवाओं की खरीद में मेडिकल स्टोर संचालकों को बिल और तत्काल भुगतान करना पड़ता है, जबकि नकली दवाएं अक्सर बिना बिल के उधार के आधार पर उपलब्ध कराई जाती हैं। विक्रेता बिक्री के बाद भुगतान करते हैं, जिससे इस अवैध नेटवर्क को बढ़ावा मिलता है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, नकली दवा कारोबार जैसे संगठित अपराधों में डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। अपराधी ऑनलाइन संपर्क, फर्जी दस्तावेज, नकली कंपनियों की पहचान और गुप्त भुगतान चैनलों के जरिए अपने नेटवर्क को संचालित करते हैं। ऐसे मामलों में केवल जब्ती की कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरे वित्तीय नेटवर्क, सप्लाई चेन और लाभार्थियों की पहचान कर कठोर कार्रवाई जरूरी है।
एफएसडीए आयुक्त डॉ. रोशन जैकब ने कहा है कि नकली दवाओं के नेटवर्क को खत्म करने के लिए प्रदेशभर में लगातार जांच अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने मेडिकल स्टोर संचालकों से अपील की है कि बिना पक्के बिल के दवाओं की खरीद-बिक्री न करें। यदि किसी दुकान पर बिना दस्तावेज वाली दवाएं मिलती हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि नकली दवाओं पर रोक लगाने के लिए दवा आपूर्ति श्रृंखला की निगरानी, डिजिटल ट्रैकिंग व्यवस्था, नियमित निरीक्षण और उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। मरीजों को भी दवा खरीदते समय पैकेजिंग, बैच नंबर, निर्माता कंपनी और बिल की जांच करनी चाहिए, ताकि नकली दवाओं के खतरे से बचा जा सके।
