पटियाला हाउस कोर्ट ने ₹52.81 लाख के टिंडर से जुड़े साइबर ठगी मामले में जमानत खारिज करते हुए डिजिटल साक्ष्यों की कमी और जांच की खामियों पर चिंता जताई।

52 लाख साइबर ठगी केस: टिंडर कनेक्शन से उलझा मामला, कोर्ट ने कहा—जांच अधूरी और डिजिटल सबूत कमजोर

Team The420
5 Min Read

दिल्ली के पटियाला हाउस स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने टिंडर के जरिए कथित 52.81 लाख रुपये की साइबर धोखाधड़ी मामले में आरोपी दीपक वत्स की जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने अपने आदेश में जांच की वर्तमान स्थिति, डिजिटल साक्ष्यों की अनुपलब्धता और वित्तीय लेनदेन की जटिल संरचना को लेकर गंभीर टिप्पणियां की हैं। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड कई ऐसे पहलुओं की ओर इशारा करते हैं, जिनकी विस्तृत जांच अभी पूरी नहीं हुई है।

अदालत ने पाया कि घरेलू सहायिका दीया देवी के नाम पर दर्ज शिकायत में कथित डिजिटल भुगतान का प्रत्यक्ष प्रमाण पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं है। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कथित ठगी की बड़ी राशि हरियाणा में तैनात न्यायिक अधिकारी हरशाली चौधरी के बैंक खातों के माध्यम से आरोपी तक पहुंची, जिससे मामला और अधिक संदिग्ध एवं जटिल हो गया है।

FCRF Launches Chief AI Officer Certification to Build India’s AI Governance Leaders

सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही ई-एफआईआर घरेलू सहायिका के नाम से दर्ज की गई हो, लेकिन बैंक रिकॉर्ड यह संकेत देते हैं कि वास्तविक वित्तीय लेनदेन न्यायिक अधिकारी के खातों के जरिए हुए प्रतीत होते हैं। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जांच एजेंसी अब तक मोबाइल चैट, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और टिंडर चैट हिस्ट्री जैसे अहम डिजिटल साक्ष्यों को पूरी तरह से एकत्र करने में असफल रही है।

कोर्ट ने यह भी पाया कि आरोपी ने अपने बचाव में केवल आंशिक व्हाट्सऐप संदेश प्रस्तुत किए हैं और जांच के दौरान मोबाइल फोन का पासवर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया, जिससे फॉरेंसिक जांच प्रभावित हुई है। अदालत ने कहा कि इस कारण डिजिटल साक्ष्यों की स्वतंत्र पुष्टि बाधित हुई है, जो मामले की निष्पक्ष जांच के लिए आवश्यक है।

इसके अलावा अदालत ने पांच लाख रुपये की नकद राशि जमा किए जाने पर भी सवाल उठाए, जिसे अदालत कर्मचारी के माध्यम से नारनौल में जमा कराया गया था। कोर्ट ने कहा कि इस धनराशि के स्रोत की स्वतंत्र जांच आवश्यक है और इससे जुड़े सभी व्यक्तियों के बयान दर्ज किए जाने चाहिए।

अदालत ने टिप्पणी की कि आरोपी, शिकायतकर्ता और जांच प्रक्रिया तीनों के व्यवहार के कारण यह मामला और अधिक उलझ गया है। कोर्ट ने कहा कि जो मामला सामान्य परिस्थितियों में अपेक्षाकृत सरल हो सकता था, वह अब कई अनसुलझे सवालों और जटिलताओं से घिर चुका है।

आरोपी दीपक वत्स का कहना है कि उसके और संबंधित महिला के बीच सहमति से संबंध थे और सभी धनराशि स्वेच्छा से भेजी गई थी। वहीं अभियोजन पक्ष का आरोप है कि आरोपी ने खुद को एक गुप्त सरकारी विभाग का अधिकारी बताकर विश्वास हासिल किया और निवेश तथा अन्य बहानों के जरिए बड़ी रकम प्राप्त की।

अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े मामलों में तकनीकी साक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना स्वतंत्र रूप से सत्यापित चैट रिकॉर्ड, डिवाइस डेटा और बैंक ट्रेल के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

अदालत ने जांच एजेंसी को निर्देश दिया कि सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, बैंक खातों और वित्तीय लेनदेन की विस्तृत जांच की जाए। साथ ही नकद जमा राशि के स्रोत की पुष्टि कर संबंधित सभी व्यक्तियों के बयान दर्ज किए जाएं।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जांच अधिकारी चार सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करे और संबंधित न्यायिक अधिकारी को जांच एजेंसियों के समक्ष उपस्थित होकर सभी तथ्य स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड पर रखने होंगे, ताकि सच्चाई सामने आ सके।

फिलहाल अदालत ने जमानत याचिका खारिज करते हुए जांच जारी रखने की अनुमति दी है और कहा है कि आगामी सुनवाई में विस्तृत रिपोर्ट और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आगे निर्णय लिया जाएगा।

अदालत ने यह भी कहा कि बढ़ते साइबर फ्रॉड मामलों को देखते हुए जांच एजेंसियों को डिजिटल फॉरेंसिक क्षमता को और मजबूत करना होगा, ताकि ऐसे मामलों में निष्पक्ष और प्रभावी जांच सुनिश्चित की जा सके।

हमसे जुड़ें

Share This Article