महिलाओं के स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए निर्धारित सरकारी अनुदान में कथित गड़बड़ी के एक बड़े मामले में पूर्व उद्योग विस्तार अधिकारी प्रवीण राज टी.आर. को गिरफ्तार किया गया है। जांच एजेंसियों के अनुसार, तिरुवनंतपुरम निगम क्षेत्र में वर्ष 2020-21 के दौरान संचालित एक स्वरोजगार योजना के तहत वितरित की जाने वाली ₹3.57 करोड़ की सब्सिडी में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं का आरोप है। मामले ने एक बार फिर सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जांच के अनुसार, यह योजना सामान्य वर्ग की महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। योजना के तहत पात्र लाभार्थियों को व्यवसाय शुरू करने या आर्थिक गतिविधियां बढ़ाने के लिए सरकारी सहायता प्रदान की जानी थी। आरोप है कि निर्धारित लाभार्थियों तक राशि पहुंचाने के बजाय दस्तावेजों में हेरफेर कर यह दर्शाया गया कि सब्सिडी का वितरण कर दिया गया है।
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मामले की जांच कर रही एजेंसी का दावा है कि फर्जी रिकॉर्ड और कथित रूप से तैयार किए गए दस्तावेजों के माध्यम से करोड़ों रुपये की राशि को वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचने से पहले ही दूसरी दिशा में मोड़ दिया गया। जांच में सामने आया है कि यह धनराशि कथित तौर पर एक निजी फर्म से जुड़े बैंक खातों में स्थानांतरित की गई। इस मामले में सिंधु नामक एक अन्य आरोपी का भी नाम सामने आया है, जिसकी फर्म के खातों में राशि पहुंचने का आरोप है।
प्रवीण राज टी.आर., जिनकी उम्र 37 वर्ष बताई गई है, तिरुवनंतपुरम जिले के कंजीरामकुलम क्षेत्र के निवासी हैं। वह पहले तिरुवनंतपुरम निगम में उद्योग विस्तार अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। गिरफ्तारी के समय वह कोल्लम तालुक में उप-जिला उद्योग अधिकारी के पद पर तैनात थे। गिरफ्तारी के बाद उन्हें अदालत में पेश किया गया, जहां से न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
जांच एजेंसियों के अनुसार, मामला केवल ₹3.57 करोड़ की कथित अनियमितता तक सीमित नहीं है। प्रवीण राज का नाम तिरुवनंतपुरम निगम से जुड़े दो अन्य वित्तीय अनियमितता मामलों में भी सामने आया है। इनमें से एक मामला अनुसूचित जाति वर्ग की महिलाओं के लिए निर्धारित सब्सिडी योजना से जुड़ा है, जिसमें लगभग ₹24 लाख के गबन का आरोप लगाया गया है।
दूसरा मामला गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली महिलाओं के स्वरोजगार कार्यक्रम से संबंधित बताया गया है। इस प्रकरण में करीब ₹1.14 करोड़ की राशि के दुरुपयोग की जांच की जा रही है। इन मामलों के कारण जांच एजेंसियां अब यह भी पड़ताल कर रही हैं कि क्या विभिन्न योजनाओं में एक समान तरीके से कथित वित्तीय हेरफेर किया गया था।
वित्तीय रिकॉर्ड, बैंक खातों और दस्तावेजों की विस्तृत जांच के दौरान अधिकारियों को कई ऐसे लेनदेन और अभिलेख मिले, जिनके आधार पर कार्रवाई को आगे बढ़ाया गया। जांचकर्ताओं का मानना है कि पूरे नेटवर्क और धन के प्रवाह की सटीक जानकारी जुटाने के लिए कई स्तरों पर दस्तावेजी विश्लेषण किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कल्याणकारी योजनाओं में होने वाली वित्तीय अनियमितताएं केवल सरकारी धन के नुकसान तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि उन लाभार्थियों को भी प्रभावित करती हैं जिनके लिए योजनाएं बनाई जाती हैं। महिलाओं के स्वरोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण के उद्देश्य से निर्धारित राशि यदि वास्तविक पात्रों तक नहीं पहुंचती, तो इससे योजना का मूल उद्देश्य ही प्रभावित होता है।
प्रारंभिक जांच में सामने आए तथ्यों ने मामले को गंभीर बना दिया है और अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि कथित हेराफेरी में और कौन-कौन लोग शामिल थे। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि धनराशि का अंतिम उपयोग कहां और किस उद्देश्य के लिए किया गया।
तिरुवनंतपुरम का यह मामला सरकारी अनुदान योजनाओं के क्रियान्वयन, निगरानी तंत्र और जवाबदेही व्यवस्था पर नए सिरे से बहस छेड़ सकता है। आने वाले दिनों में जांच की दिशा और अदालत में प्रस्तुत होने वाले साक्ष्य इस बहुचर्चित मामले की आगे की तस्वीर स्पष्ट करेंगे।
