बोकारो वेतन घोटाले में रिटायर्ड कर्मियों के नाम पर निकासी, ट्रेजरी निगरानी में चूक और कुबेर पोर्टल की भूमिका की जांच का प्रतीकात्मक दृश्य।

₹41 लाख साइबर ठगी का खुलासा: सूरत का चाय बेचने वाला निकला म्यूल अकाउंट का कड़ी, मुंबई कनेक्शन से गिरफ्तारी

Roopa
By Roopa
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मुंबई/सूरत: निवेश के नाम पर बढ़ती साइबर ठगी के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें सूरत का एक 21 वर्षीय चाय विक्रेता ₹41 लाख की धोखाधड़ी में अहम कड़ी के रूप में गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि उसने अपने बैंक खाते का इस्तेमाल साइबर ठगों को पैसे ट्रांसफर करने के लिए करने दिया, जिससे वह पूरे रैकेट का “म्यूल अकाउंट” बन गया।

जांच में सामने आया कि यह मामला मुंबई के बोरीवली इलाके में रहने वाले एक 60 वर्षीय व्यक्ति से जुड़ा है, जिसे सोशल मीडिया के जरिए ऊंचे मुनाफे का लालच देकर जाल में फंसाया गया। पीड़ित को पहले फेसबुक पर संपर्क किया गया और बाद में व्हाट्सऐप के जरिए बातचीत आगे बढ़ाई गई। खुद को निवेश सलाहकार बताने वाली एक महिला ने उसे भरोसे में लेकर धीरे-धीरे निवेश के लिए तैयार किया।

पीड़ित को “S18-Value Growth Circle” नामक एक व्हाट्सऐप ग्रुप में जोड़ा गया, जहां पहले से मौजूद कई फर्जी प्रोफाइल्स लगातार मुनाफे की कहानियां साझा कर रहे थे। इन नकली सफलताओं के जरिए पीड़ित का विश्वास जीत लिया गया और उसे एक फर्जी ट्रेडिंग ऐप डाउनलोड करने के लिए कहा गया। इसके बाद उसने कई चरणों में लाखों रुपये अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर दिए।

जांच के दौरान यह सामने आया कि ट्रांजैक्शन की एक कड़ी सूरत निवासी सचिन मनोजभाई मोडनवा के बैंक खाते तक पहुंचती है, जिसमें लगभग ₹2 लाख की राशि ट्रांसफर की गई थी। इसके आधार पर उसकी पहचान कर उसे सूरत से गिरफ्तार किया गया।

पूछताछ में यह खुलासा हुआ कि आरोपी सूरत में चाय का ठेला चलाता है और उसने आर्थिक लाभ के लालच में अपना बैंक खाता साइबर ठगों को इस्तेमाल करने के लिए दे दिया था। इसके बदले उसे कमीशन दिया जाता था। जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि वह ऐसे कई लेनदेन में शामिल रहा है।

इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोपी खुद ठगी का मास्टरमाइंड नहीं था, बल्कि एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा था, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में फैला हुआ है। ऐसे नेटवर्क में “म्यूल अकाउंट” का इस्तेमाल कर पैसे को तेजी से एक खाते से दूसरे खाते में ट्रांसफर किया जाता है, ताकि असली अपराधियों तक पहुंचना मुश्किल हो जाए।

जांच एजेंसियों को शक है कि यह एक संगठित इंटरस्टेट साइबर फ्रॉड रैकेट है, जिसमें कई लोग अलग-अलग भूमिकाओं में काम कर रहे हैं—कोई लोगों को फंसाता है, कोई फर्जी ऐप बनाता है और कोई बैंक खातों के जरिए पैसा घुमाने का काम करता है।

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इस तरह के मामलों पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह कहते हैं, “आजकल साइबर अपराधी सीधे हैकिंग से ज्यादा सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे भरोसा, लालच और डर का इस्तेमाल करके लोगों को खुद ही पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर कर देते हैं। म्यूल अकाउंट इस पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा होते हैं, जिनके जरिए अपराधी अपनी पहचान छुपाते हैं।”

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर निवेश करना या बैंक खाता इस्तेमाल के लिए देना गंभीर अपराध में शामिल होने जैसा है। “अक्सर लोग यह सोचकर अपना खाता दे देते हैं कि उन्हें कुछ पैसा मिल जाएगा, लेकिन वे अनजाने में बड़े साइबर अपराध का हिस्सा बन जाते हैं,” उन्होंने कहा।

इस घटना ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि साइबर ठग अब आम लोगों को ही अपने नेटवर्क का हिस्सा बना रहे हैं। बेरोजगारी या आर्थिक दबाव का फायदा उठाकर युवाओं को म्यूल अकाउंट के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

फिलहाल, इस मामले में आगे की जांच जारी है और पूरे नेटवर्क का पता लगाने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। साथ ही, ठगी की रकम को ट्रेस कर पीड़ित को राहत दिलाने की कोशिश भी की जा रही है।

यह मामला आम लोगों के लिए एक चेतावनी है कि सोशल मीडिया पर मिलने वाले निवेश ऑफर्स से सावधान रहें और कभी भी अपने बैंक खाते या व्यक्तिगत जानकारी को किसी के साथ साझा न करें, क्योंकि एक छोटी सी लापरवाही बड़े आर्थिक नुकसान में बदल सकती है।

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