10 साल में ₹1,270 करोड़ के सरकारी काम परिवार से जुड़ी कंपनियों को मिलने का दावा, 16 हफ्तों में मांगी रिपोर्ट

अरुणाचल में ठेकों पर परिवारवाद के आरोप: सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए

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By Roopa
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नई दिल्ली: देश की शीर्ष अदालत ने अरुणाचल प्रदेश में सार्वजनिक निर्माण कार्यों के ठेकों को लेकर लगे गंभीर आरोपों पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को प्रारंभिक जांच करने का निर्देश दिया है। यह आदेश उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि राज्य में बड़े पैमाने पर सरकारी ठेके मुख्यमंत्री Pema Khandu के परिवार से जुड़ी कंपनियों को दिए गए।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “सीबीआई प्रारंभिक जांच करे और 16 सप्ताह के भीतर यह बताए कि क्या स्वतंत्र जांच की आवश्यकता है।” अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच 2015 से 2025 के बीच दिए गए ठेकों पर केंद्रित होगी।

याचिका दो संगठनों—सेव मोन रीजन फेडरेशन और वॉलंटरी अरुणाचल सेना—द्वारा दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पिछले एक दशक में लगभग ₹1,270 करोड़ के सरकारी कार्य ऐसे फर्मों को दिए गए, जिनका सीधा संबंध मुख्यमंत्री, उनकी पत्नी या उनकी माता से है।

ठेकों में अनियमितता के आरोप विस्तार से

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता Prashant Bhushan ने अदालत को बताया कि मुख्यमंत्री के परिवार से जुड़ी कंपनियों को असामान्य रूप से अधिक ठेके दिए गए। उनके अनुसार, ‘ब्रांड ईगल्स’ नामक कंपनी, जो मुख्यमंत्री की पत्नी के स्वामित्व में बताई गई है, को 11 वर्षों में 31 ठेके मिले।

इसी तरह ‘फ्रंटियर एसोसिएट्स’ नामक एक अन्य कंपनी, जिसे मुख्यमंत्री से जुड़ा बताया गया, को 91 ठेके दिए गए, जिनकी कुल कीमत लगभग ₹145 करोड़ बताई गई। याचिका में यह भी दावा किया गया कि 121 कार्य, जिनकी कीमत ₹245 करोड़ है, टेंडर प्रक्रिया के जरिए दिए गए, जबकि 322 कार्य, जिनकी कीमत करीब ₹25 करोड़ है, बिना टेंडर के आवंटित किए गए।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कुल मिलाकर 15 कंपनियां ऐसी हैं, जिनकी जांच जरूरी है। उनका दावा है कि राज्य के कुल सरकारी ठेकों में से करीब 3 प्रतिशत इन कंपनियों को दिए गए, जो पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।

सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि “स्थिति में भ्रष्टाचार की गंध है और स्वतंत्र जांच जरूरी है।”

राज्य पुलिस पर निष्पक्षता को लेकर सवाल

याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने यह भी दलील दी कि चूंकि मामला राज्य के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति से जुड़ा है, इसलिए राज्य पुलिस द्वारा निष्पक्ष जांच संभव नहीं है। इसी आधार पर उन्होंने विशेष जांच दल (SIT) से जांच कराने की मांग की थी।

हालांकि, अदालत ने इस चरण पर सीबीआई से प्रारंभिक जांच कराने का फैसला लिया और आगे की कार्रवाई रिपोर्ट के आधार पर तय करने की बात कही।

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सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और आगे की प्रक्रिया

अदालत ने अपने आदेश में कई महत्वपूर्ण निर्देश भी दिए हैं। सीबीआई को 2015 से 2025 तक ठेकों के आवंटन और उनके क्रियान्वयन की जांच करनी होगी। इसके साथ ही राज्य सरकार को जांच में पूरा सहयोग देने के लिए कहा गया है।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य का मुख्य सचिव एक नोडल अधिकारी नियुक्त करेगा, जो सीबीआई को सभी जरूरी दस्तावेज और रिकॉर्ड समय पर उपलब्ध कराएगा। इस प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार को एक सप्ताह के भीतर अनुपालन करने का निर्देश दिया गया है।

इस मामले में पहले भी अदालत ने राज्य सरकार से विस्तृत हलफनामा मांगा था, जिसमें इन वर्षों के दौरान दिए गए सभी ठेकों का विवरण शामिल हो।

राजनीतिक हलचल और व्यापक असर

इन आरोपों के सामने आने के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने इसे खुला परिवारवाद बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। वहीं, सत्तारूढ़ पक्ष ने आरोपों को राजनीतिक प्रेरित करार देते हुए खारिज किया है।

मामला राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि यह सार्वजनिक ठेकों के आवंटन में पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में निष्पक्ष जांच से शासन व्यवस्था में विश्वास बनाए रखना बेहद जरूरी है।

आगे क्या?

सीबीआई की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट अब इस पूरे मामले की दिशा तय करेगी। 16 हफ्तों में आने वाली यह रिपोर्ट यह स्पष्ट करेगी कि क्या विस्तृत और स्वतंत्र जांच की आवश्यकता है या नहीं।

तब तक यह मामला सरकारी ठेकों की प्रक्रिया, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता रहेगा।

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