नई दिल्ली। Supreme Court of India ने अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (ADAG) से जुड़े कथित बैंक फ्रॉड मामले में जांच एजेंसियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए साफ कहा है कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और भरोसेमंद होनी चाहिए। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि पहले जांच में “ढिलाई” और “संरचना की कमी” दिखाई दी, जो स्वीकार्य नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत यह तय नहीं करेगी कि किसे गिरफ्तार किया जाए, लेकिन जांच एजेंसियों का रवैया ऐसा होना चाहिए जिससे हर पक्ष को भरोसा हो सके कि जांच स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से हुई है।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने अदालत को बताया कि मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया है और अब तक करीब ₹15,000 करोड़ की संपत्तियां जब्त की जा चुकी हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इस कथित घोटाले में अब तक ₹40,185.55 करोड़ के सार्वजनिक धन के नुकसान की पहचान की गई है।
अदालत ने साफ तौर पर कहा कि जांच एजेंसियों को आपसी समन्वय के साथ काम करते हुए किसी भी तरह की अनियमितता, अवैध गतिविधि या सार्वजनिक अधिकारियों की मिलीभगत की गहराई से जांच करनी चाहिए। विशेष रूप से वित्तीय संस्थानों की भूमिका को लेकर भी अदालत ने गंभीरता से जांच करने को कहा।
सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि फिलहाल सात अलग-अलग मामलों की जांच जारी है और सार्वजनिक सेवकों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। साथ ही, तीन ट्रांजैक्शन ऑडिटर्स को नियुक्त किया गया है, जो वित्तीय लेन-देन में किसी भी तरह की गड़बड़ी या सांठगांठ की जांच कर रहे हैं।
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सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों का काम केवल औपचारिकता निभाना नहीं, बल्कि ऐसा परिणाम देना है जिससे आम जनता को यह विश्वास हो कि कानून का पालन निष्पक्ष तरीके से हुआ है। अदालत ने कहा कि यदि किसी भी एजेंसी या संस्था की ओर से सहयोग में देरी या अनिच्छा दिखाई जाती है, तो इसकी जानकारी सीधे अदालत को दी जानी चाहिए।
वहीं, उद्योगपति Anil Ambani की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Mukul Rohatgi ने अदालत से अनुरोध किया कि उनके मुवक्किल को बैंकों के साथ बातचीत का अवसर दिया जाए, ताकि किसी “सार्थक समाधान” तक पहुंचा जा सके। इस पर अदालत ने कहा कि उसने किसी भी बातचीत पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन यह प्रक्रिया किसी भी व्यक्ति को कानूनी जिम्मेदारी से बचने का जरिया नहीं बननी चाहिए।
सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि मामले में अब तक बहुत कम गिरफ्तारियां हुई हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि अब तक चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है और बिना ठोस आधार के किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से इस पर आपत्ति जताई गई और कहा गया कि अब तक केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई है।
गौरतलब है कि इससे पहले अदालत ने फरवरी में निर्देश दिया था कि इस पूरे मामले में कथित सांठगांठ, साजिश और बैंक अधिकारियों व कंपनी प्रबंधन के बीच संबंधों की व्यापक जांच की जाए। आरोप है कि इस घोटाले में फर्जी बैंक गारंटी जारी कर वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम दिया गया।
अदालत ने अपने ताजा रुख में साफ कर दिया है कि जांच का दायरा व्यापक होना चाहिए और इसे तय समयसीमा के भीतर तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना जरूरी है। इस सख्त टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने संकेत दिया है कि इस हाई-प्रोफाइल मामले में अब जांच एजेंसियों की जवाबदेही पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।
