रिपोर्ट में खुलासा—फर्जी विज्ञापनों से शुरू होता है ठगी का खेल, मैसेजिंग ऐप्स तक पहुंचकर बनता है बड़ा जाल

सोशल मीडिया बना फ्रॉड का नया अड्डा: APP स्कैम में तेजी, बैंकों के साथ टेक प्लेटफॉर्म पर भी जिम्मेदारी तय करने की मांग

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली: डिजिटल दुनिया में तेजी से बढ़ते वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों के बीच एक नई रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अब ऑथराइज्ड पुश पेमेंट (APP) फ्रॉड का सबसे बड़ा जरिया बनते जा रहे हैं। The Payments Association द्वारा जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ठगी के अधिकांश मामलों की शुरुआत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फर्जी विज्ञापनों और पोस्ट के जरिए होती है, जिसके बाद पीड़ितों को मैसेजिंग ऐप्स के जरिए जाल में फंसाया जाता है।

रिपोर्ट “The New Origin of APP Fraud” के मुताबिक, मौजूदा सिस्टम में एक बड़ा असंतुलन है—जहां बैंक और पेमेंट कंपनियां ठगी का वित्तीय बोझ उठा रही हैं, वहीं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी कोई जवाबदेही तय नहीं की गई है, जहां से ज्यादातर फ्रॉड की शुरुआत होती है।

APP फ्रॉड वह प्रक्रिया है, जिसमें ठग पीड़ित को खुद ही अपने खाते से पैसे ट्रांसफर करने के लिए मानसिक रूप से प्रभावित करते हैं। यह आमतौर पर भरोसा जीतने, झूठे वादों या डर पैदा करने जैसी रणनीतियों के जरिए किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, ठगी की शुरुआत अक्सर Meta के प्लेटफॉर्म जैसे Facebook और Instagram पर दिखने वाले फर्जी विज्ञापनों से होती है, जिसके बाद बातचीत WhatsApp या Telegram जैसे निजी मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर शिफ्ट हो जाती है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वर्ष 2025 की पहली छमाही में केवल यूके में ही APP फ्रॉड के कारण £250 मिलियन (करीब ₹2,600 करोड़) से अधिक का नुकसान हुआ, जिसमें लगभग दो-तिहाई मामलों की शुरुआत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से हुई थी। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब साइबर अपराधियों के लिए सबसे आसान प्रवेश द्वार बन चुके हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा नियामक ढांचे में खामियां हैं। जहां बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को ग्राहकों को नुकसान की भरपाई करनी पड़ती है, वहीं सोशल मीडिया कंपनियों पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। इस असंतुलन के कारण ठगी के असली स्रोत पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है।

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रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि इस समस्या से निपटने के लिए “शेयर्ड लायबिलिटी” यानी साझा जिम्मेदारी का मॉडल लागू किया जाना चाहिए। इसके तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी जवाबदेह बनाया जाए, खासकर तब जब उनकी साइट्स पर फर्जी विज्ञापन या धोखाधड़ी से जुड़ा कंटेंट बार-बार सामने आता है।

सिफारिशों में ऑनलाइन विज्ञापन देने वालों के लिए अनिवार्य पहचान सत्यापन, फर्जी कंटेंट हटाने के लिए तय समय सीमा और नियमों का पालन न करने पर वित्तीय दंड जैसे कदम शामिल हैं। इसके अलावा, टेक कंपनियों और वित्तीय संस्थानों के बीच रियल-टाइम डेटा साझा करने की व्यवस्था को भी मजबूत करने की जरूरत बताई गई है, ताकि शुरुआती स्तर पर ही फ्रॉड की पहचान कर उसे रोका जा सके।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्तमान में बैंक धोखाधड़ी के अंतिम चरण पर कार्रवाई करते हैं, जबकि ठगी की असली शुरुआत सोशल मीडिया पर होती है। ऐसे में केवल बैंकों पर जिम्मेदारी डालना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

साइबर अपराध विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल इंजीनियरिंग अब साइबर फ्रॉड का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। ठग पहले भरोसा बनाते हैं, फिर निवेश, नौकरी या ऑफर के नाम पर लोगों को फंसाते हैं और अंत में उनसे खुद ही पैसे ट्रांसफर करवा लेते हैं।

इसी संदर्भ में प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह कहते हैं, “साइबर अपराधी अब तकनीक से ज्यादा इंसानी व्यवहार का फायदा उठा रहे हैं। सोशल मीडिया पर दिखने वाले फर्जी विज्ञापन और प्रोफाइल्स के जरिए वे पहले भरोसा बनाते हैं और फिर धीरे-धीरे पीड़ित को आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं। जब तक सोर्स यानी शुरुआत के प्लेटफॉर्म पर सख्ती नहीं होगी, तब तक इस तरह के फ्रॉड को पूरी तरह रोकना मुश्किल है।”

वैश्विक स्तर पर भी अब टेक कंपनियों की जवाबदेही को लेकर बहस तेज हो गई है। कई देशों में सरकारें इस दिशा में सख्त नियम बनाने पर विचार कर रही हैं, ताकि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को यूजर्स की सुरक्षा के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाया जा सके।

ऐसे में यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि डिजिटल फ्रॉड से निपटने के लिए केवल बैंकिंग सिस्टम को मजबूत करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए सोशल मीडिया कंपनियों, टेक प्लेटफॉर्म्स और वित्तीय संस्थानों के बीच समन्वय और सख्त नियमों की जरूरत होगी—तभी इस बढ़ते खतरे पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकेगा।

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