रोहतक: हरियाणा के रोहतक जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को अपने कर्मचारी द्वारा कथित रूप से की गई धोखाधड़ी के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए 80 वर्षीय महिला को ₹4.02 लाख लौटाने का आदेश दिया है। आयोग ने बैंक को निर्देश दिया कि वह संबंधित राशि पर निकासी की तारीख से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी अदा करे। इसके अलावा मानसिक उत्पीड़न और सेवा में कमी के लिए ₹5,000 तथा मुकदमेबाजी खर्च के रूप में ₹5,000 अतिरिक्त देने का भी आदेश दिया गया है।
मामला कृष्णा नामक महिला की शिकायत से जुड़ा है। उन्होंने आयोग को बताया कि उनका और उनके पति का SBI में संयुक्त बचत खाता है। उनके अनुसार 29 अक्टूबर 2019 से 12 फरवरी 2020 के बीच अलग-अलग तारीखों पर उनके खाते से कुल ₹4.37 लाख की राशि कथित रूप से फर्जी तरीके से निकाल ली गई। जब उन्हें इस लेनदेन की जानकारी मिली तो उन्होंने बैंक शाखा से संपर्क किया।
शिकायत के अनुसार शाखा प्रबंधक ने उन्हें बताया कि बैंक के एक कर्मचारी ने अवैध रूप से खाते से राशि निकाली है और भरोसा दिया कि पूरी रकम उनके खाते में वापस जमा कर दी जाएगी। हालांकि, काफी समय बीत जाने के बावजूद न तो राशि लौटाई गई और न ही उन्हें कोई ठोस समाधान मिला। इसके बाद 1 मार्च 2020 को उनके पति ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई।
महिला ने आयोग के समक्ष दलील दी कि बैंक द्वारा उनकी जमा पूंजी की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करना सेवा में स्पष्ट कमी है। उन्होंने कहा कि वर्षों की बचत खोने और लंबे समय तक धन वापस न मिलने से उन्हें मानसिक पीड़ा और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
दूसरी ओर, SBI और संबंधित शाखा प्रबंधक ने संयुक्त जवाब दाखिल कर शिकायत का विरोध किया। बैंक ने दावा किया कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार विवादित राशि स्वयं खाताधारक द्वारा निकाली गई थी। बैंक ने यह भी कहा कि कथित अनियमितताओं की जांच अभी लंबित है और जांच पूरी होने के बाद बैंक के नियमों के अनुरूप आगे की कार्रवाई की जाएगी। बैंक ने आयोग से शिकायत खारिज करने का अनुरोध किया।
Registration Begins for FutureCrime Summit 2026, India’s Largest Cybercrime Conference
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद आयोग ने पाया कि बैंक यह साबित करने में विफल रहा कि विवादित निकासी स्वयं शिकायतकर्ता या उनके अधिकृत प्रतिनिधि ने की थी। आयोग ने कहा कि बैंक ने न तो हस्ताक्षरों की पुष्टि के लिए किसी विशेषज्ञ की राय प्रस्तुत की, न ही हस्तलेखन परीक्षण अथवा फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) की रिपोर्ट रिकॉर्ड पर रखी।
आयोग ने यह भी उल्लेख किया कि महिला के पति द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी में बैंक के कर्मचारी पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया था। साथ ही बैंक ने स्वयं अपने जवाब में स्वीकार किया था कि कथित धोखाधड़ी की जांच चल रही है और जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की जाएगी। आयोग ने माना कि इससे यह स्पष्ट होता है कि बैंक के भीतर कथित अनियमितता की जांच आवश्यक समझी गई थी।
अपने आदेश में आयोग ने कहा कि ग्राहकों द्वारा बैंक में जमा की गई राशि की सुरक्षा सुनिश्चित करना बैंक का दायित्व है। यदि किसी कर्मचारी द्वारा कथित रूप से गलत कार्य किया जाता है तो उसके लिए नियोक्ता के रूप में बैंक भी उत्तरदायी होगा। इसी आधार पर आयोग ने SBI को ₹4.02 लाख की राशि 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाने का निर्देश दिया। साथ ही सेवा में कमी के लिए ₹5,000 मुआवजा और ₹5,000 मुकदमे का खर्च 30 दिनों के भीतर अदा करने का आदेश दिया।
उपभोक्ता अधिकारों के दृष्टिकोण से यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह स्पष्ट करता है कि बैंक केवल लेनदेन कराने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ग्राहकों की जमा पूंजी की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उनकी कानूनी जिम्मेदारी है। यदि बैंक के कर्मचारी की कथित लापरवाही या धोखाधड़ी से ग्राहक को आर्थिक नुकसान होता है और बैंक पर्याप्त सुरक्षा या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाता, तो उपभोक्ता आयोग बैंक को जिम्मेदार ठहरा सकता है और प्रभावित ग्राहक को राहत प्रदान कर सकता है।
