नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) और अन्य विनियमित वित्तीय संस्थानों में ग्राहकों की व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा और डेटा प्रबंधन को मजबूत बनाने के उद्देश्य से व्यापक मसौदा दिशा-निर्देश जारी किए हैं। प्रस्तावित ढांचे के तहत प्रत्येक ग्राहक की जानकारी को एक विशिष्ट डिजिटल टैग (Digital Tag) दिया जाएगा, जिससे यह रिकॉर्ड रखा जा सकेगा कि डेटा कब एकत्र किया गया, किस उद्देश्य से लिया गया, ग्राहक की सहमति कब प्राप्त हुई, उसका उपयोग कहां किया गया, किसके साथ साझा किया गया और उसे कब हटाया जाना है। आरबीआई ने इस मसौदे पर सभी हितधारकों से 17 अगस्त तक सुझाव और टिप्पणियां आमंत्रित की हैं।
प्रस्तावित दिशा-निर्देशों के अनुसार, प्रत्येक वित्तीय संस्थान को ग्राहक के डेटा का पूरा जीवनचक्र (Data Lifecycle) डिजिटल रूप से दर्ज करना होगा। प्रत्येक डेटा रिकॉर्ड के साथ एक विशेष डिजिटल टैग जोड़ा जाएगा, जिसमें ग्राहक का नाम, डेटा एकत्र करने का उद्देश्य, जानकारी की संवेदनशीलता, उपयोग की अनुमति, डेटा को सुरक्षित रखने की निर्धारित अवधि और उसके निस्तारण का विवरण शामिल होगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य ग्राहक की जानकारी के उपयोग में पारदर्शिता बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना है कि डेटा केवल स्वीकृत उद्देश्यों के लिए ही इस्तेमाल किया जाए।
आरबीआई के मसौदे में यह भी प्रस्तावित किया गया है कि यदि किसी ग्राहक का डेटा किसी सहयोगी संस्था, फिनटेक कंपनी, सेवा प्रदाता या अन्य अधिकृत तीसरे पक्ष के साथ साझा किया जाता है, तो संबंधित डिजिटल टैग भी उसके साथ स्थानांतरित होगा। इससे डेटा की पूरी यात्रा (Data Trail) का रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा और यह आसानी से पता लगाया जा सकेगा कि ग्राहक की जानकारी किन संस्थाओं या प्रणालियों में मौजूद है तथा उसका उपयोग किन उद्देश्यों के लिए किया गया। इससे डेटा गवर्नेंस और अनुपालन प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
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प्रस्तावित ढांचे के तहत सभी विनियमित संस्थानों में बोर्ड स्तर पर डेटा गवर्नेंस समिति (Data Governance Committee) गठित करने का भी सुझाव दिया गया है। यह समिति डेटा प्रबंधन से जुड़ी नीतियों को मंजूरी देगी और नियमित रूप से डेटा की गुणवत्ता, सुरक्षा, गोपनीयता तथा नियामकीय अनुपालन की समीक्षा करेगी। इसके अतिरिक्त प्रत्येक संस्था में एक समर्पित डेटा प्रबंधन इकाई (Data Management Unit) स्थापित करने का प्रस्ताव है, जो डेटा के रखरखाव, वर्गीकरण, सुरक्षा और जोखिम प्रबंधन से जुड़े कार्यों की निगरानी करेगी।
आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई बैंक या अन्य विनियमित संस्था ग्राहक की जानकारी किसी फिनटेक कंपनी, क्लाउड सेवा प्रदाता या अन्य बाहरी सेवा प्रदाता के साथ साझा करती है, तब भी उस जानकारी की सुरक्षा की अंतिम जिम्मेदारी संबंधित बैंक या वित्तीय संस्था की ही रहेगी। ऐसे मामलों में डेटा साझा करने से पहले उचित कानूनी समझौते, मजबूत एन्क्रिप्शन, साइबर सुरक्षा नियंत्रण और जोखिम प्रबंधन उपाय लागू करना अनिवार्य होगा। नियामक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाहरी सेवा प्रदाताओं के उपयोग से ग्राहकों की गोपनीयता या डेटा सुरक्षा से कोई समझौता न हो।
प्रस्तावित व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप ग्राहकों को अपने व्यक्तिगत डेटा पर अधिक नियंत्रण प्रदान करेगी। यदि कोई ग्राहक अपनी सहमति वापस लेता है या अपने व्यक्तिगत डेटा को हटाने का अनुरोध करता है, तो डिजिटल टैगिंग प्रणाली के माध्यम से यह पहचानना आसान होगा कि संबंधित जानकारी किन-किन सिस्टम, सर्वर या साझेदार संस्थाओं के पास मौजूद है। इससे डेटा हटाने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रभावी बन सकेगी।
Future Crime Research Foundation के विशेषज्ञों के अनुसार, वित्तीय क्षेत्र में डेटा का केंद्रीकृत प्रबंधन, डिजिटल टैगिंग और मजबूत डेटा गवर्नेंस साइबर सुरक्षा तथा गोपनीयता संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। उनका कहना है कि ग्राहकों की सहमति का स्पष्ट रिकॉर्ड, डेटा उपयोग की ट्रेसबिलिटी, एन्क्रिप्शन, नियमित सुरक्षा ऑडिट और बोर्ड स्तर पर निगरानी से डेटा दुरुपयोग और अनधिकृत पहुंच के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्तावित दिशा-निर्देश प्रभावी रूप से लागू किए जाते हैं, तो इससे वित्तीय संस्थानों में डेटा प्रबंधन की जवाबदेही बढ़ेगी और ग्राहकों का डिजिटल बैंकिंग प्रणाली पर विश्वास भी मजबूत होगा।
