जयपुर/नई दिल्ली: बढ़ते साइबर अपराधों के बीच राजस्थान हाई कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों को निजी विवाद मानकर हल्के में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने ₹80 लाख की कथित साइबर ठगी से जुड़े मामले में आरोपी नवीन टेमानी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
यह मामला एक 83 वर्षीय महिला से जुड़ा है, जिन्हें कथित तौर पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर मानसिक दबाव और डर का माहौल बनाकर उनकी जीवनभर की जमा पूंजी ट्रांसफर कराने के लिए मजबूर किया गया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि इस तरह के संगठित साइबर अपराधों का प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज पर इसका गहरा असर पड़ता है।
अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि गंभीर आर्थिक अपराधों और संगठित साइबर ठगी के मामलों में ‘समझौता’ या ‘निजी सुलह’ के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देशभर में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे नए साइबर फ्रॉड तेजी से बढ़ रहे हैं, जिनमें अपराधी खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पीड़ित महिला को लगातार कॉल और डिजिटल माध्यमों के जरिए यह विश्वास दिलाया गया कि वह किसी गंभीर कानूनी कार्रवाई के दायरे में हैं। इस दौरान उन्हें ‘अरेस्ट’ से बचने के लिए तुरंत पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाया गया। अदालत के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा था, जिसमें तकनीक और मनोवैज्ञानिक हेरफेर दोनों का इस्तेमाल किया गया।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे मामलों में आरोपी को अग्रिम जमानत देने से जांच प्रभावित हो सकती है और संगठित नेटवर्क तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। इसलिए, इस स्तर के आर्थिक अपराधों में सख्ती जरूरी है ताकि समाज में एक स्पष्ट संदेश जाए कि साइबर ठगी को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ एक नई तरह की सोशल इंजीनियरिंग तकनीक है, जिसमें अपराधी पीड़ित के मन में डर और घबराहट पैदा करके त्वरित निर्णय लेने के लिए मजबूर करते हैं। इस मामले में भी यही रणनीति अपनाई गई, जहां बुजुर्ग महिला को कानूनी कार्रवाई का भय दिखाकर बड़ी रकम ट्रांसफर करवाई गई।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह कहते हैं, “आज के साइबर अपराधी केवल तकनीक पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि वे मानव मनोविज्ञान को समझकर उसे हथियार बना रहे हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों में अपराधी पहले भरोसा बनाते हैं, फिर डर पैदा करते हैं और अंत में आर्थिक नुकसान कराते हैं।”
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस फैसले का व्यापक असर पड़ेगा और भविष्य में ऐसे मामलों में अदालतों का रुख और सख्त हो सकता है। इससे जांच एजेंसियों को भी मजबूती मिलेगी और संगठित साइबर गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई तेज होने की उम्मीद है।
देश में हाल के महीनों में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के कई बड़े मामले सामने आए हैं, जिनमें करोड़ों रुपये की ठगी की गई है। खासतौर पर बुजुर्ग और तकनीक से कम परिचित लोग इन गिरोहों के निशाने पर होते हैं।
इस फैसले के जरिए अदालत ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि साइबर अपराध केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि एक सामाजिक चुनौती है, जिसका सख्ती से मुकाबला करना जरूरी है। ऐसे में नागरिकों को भी सतर्क रहने की जरूरत है और किसी भी संदिग्ध कॉल या मैसेज पर तुरंत भरोसा करने से बचना चाहिए।
