रायपुर: साइबर ठगी के मामलों में बैंक की जिम्मेदारी को लेकर रायपुर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने अहम फैसला सुनाया है। आयोग ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को ग्राहक की सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी मानते हुए ठगी गई ₹99,900 की रकम ब्याज समेत वापस करने का आदेश दिया है। इसके अलावा बैंक को महिला ग्राहक को मानसिक परेशानी के लिए ₹10,000 और मुकदमे के खर्च के तौर पर ₹5,000 भी देने होंगे। आयोग ने स्पष्ट किया कि जब ग्राहक अनधिकृत डिजिटल लेनदेन की जानकारी निर्धारित समयसीमा के भीतर बैंक को दे देता है, तो केवल यह कहकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता कि लेनदेन OTP या इंटरनेट बैंकिंग के जरिए सफलतापूर्वक हुआ था।
मामला 30 मार्च 2019 का है। 23 वर्षीय महिला के SBI बचत खाते से सात अलग-अलग ऑनलाइन लेनदेन के जरिए कुल ₹99,900 निकाल लिए गए थे। महिला का कहना था कि उसने इनमें से किसी भी लेनदेन को न तो अधिकृत किया था और न ही किसी व्यक्ति को इस तरह रकम ट्रांसफर करने की अनुमति दी थी। खाते से रकम निकलने के संदेश मिलने के बाद उसने उसी दिन अपने बैंक खाते का विवरण लिया और मामले की शिकायत साइबर सेल में की।
इसके बाद महिला ने 2 अप्रैल 2019 को SBI को लिखित शिकायत देकर अनधिकृत लेनदेन को रद्द करने, रकम वापस करने और मामले में आवश्यक कार्रवाई करने की मांग की। उसने 6 अप्रैल को बैंक को कानूनी नोटिस भी भेजा, लेकिन उसके अनुसार बैंक की ओर से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। महिला ने उपभोक्ता आयोग में दलील दी कि उसने RBI के नियमों के मुताबिक समय रहते बैंक को सूचना दे दी थी, इसलिए अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन के मामले में उसे ग्राहक की शून्य देनदारी वाली सुरक्षा मिलनी चाहिए थी।
SBI ने OTP और इंटरनेट बैंकिंग का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान SBI ने महिला की शिकायत पर देनदारी से इनकार किया। बैंक की ओर से तर्क दिया गया कि खाते में इंटरनेट बैंकिंग सुविधा सक्रिय थी और पंजीकृत मोबाइल नंबर तथा OTP के जरिए लेनदेन सफलतापूर्वक प्रमाणित हुए थे। बैंक ने संभावना जताई कि महिला ने अपना यूजर आईडी, पासवर्ड या अन्य गोपनीय बैंकिंग जानकारी किसी दूसरे व्यक्ति के साथ साझा की होगी।
बैंक ने यह भी कहा कि चूंकि लेनदेन तकनीकी रूप से सफल और प्रमाणित थे, इसलिए रकम को वापस नहीं किया जा सकता और नुकसान के लिए बैंक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि आयोग ने बैंक के इस तर्क को पर्याप्त नहीं माना।
शिकायत मिलने के बाद रकम रोकने की कोशिश क्यों नहीं हुई?
आयोग ने कहा कि महिला ने अनधिकृत लेनदेन की जानकारी तुरंत पुलिस को दी और तीन कार्यदिवस के भीतर बैंक के सामने भी शिकायत दर्ज कराई। ऐसे में RBI के ग्राहक दायित्व संबंधी दिशा-निर्देशों के तहत बैंक को मामले की जांच करने और विवादित रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए थे।
आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि SBI ऐसा कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि शिकायत मिलने के बाद बैंक ने अनधिकृत लेनदेन की वास्तविक जांच की थी। आयोग के अनुसार, बैंक को लेनदेन की जांच के साथ संबंधित रकम पर रोक लगाने की दिशा में तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए थी।
RBI नियमों के तहत ग्राहक को मिली राहत
27 जुलाई को दिए गए आदेश में आयोग ने RBI के अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन से संबंधित दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि निर्धारित अवधि के भीतर शिकायत करने वाले ग्राहक पर परिस्थितियों के अनुसार शून्य देनदारी लागू हो सकती है। इस मामले में महिला ने उसी दिन पुलिस को शिकायत दी और तीन कार्यदिवस के भीतर SBI को भी सूचित कर दिया था।
आयोग ने माना कि ऐसी स्थिति में ₹99,900 की विवादित रकम वापस करना बैंक की जिम्मेदारी थी। रकम वापस नहीं करने को आयोग ने सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार माना। आदेश के तहत बैंक को मूल राशि ब्याज समेत लौटानी होगी। साथ ही ₹10,000 मानसिक परेशानी और ₹5,000 मुकदमे के खर्च के लिए देने होंगे।
फैसला डिजिटल बैंकिंग से जुड़े उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयोग के आदेश से यह संकेत मिलता है कि अनधिकृत ऑनलाइन लेनदेन की सूचना समय पर मिलने के बाद बैंक को केवल तकनीकी प्रमाणीकरण का हवाला देकर मामला बंद नहीं करना चाहिए। शिकायत के बाद लेनदेन की जांच, रकम को रोकने के प्रयास और नियामकीय नियमों के अनुसार ग्राहक को राहत देना बैंक की जिम्मेदारी का हिस्सा है।
