महाराष्ट्र के पुणे शहर में सरकारी अनुदान दिलाने का झांसा देकर एक महिला से ₹40 लाख की कथित ठगी का मामला सामने आया है। आरोप है कि एक संगठन के अध्यक्ष ने उद्योग-व्यवसाय के लिए सरकारी योजनाओं के तहत अनुदान मंजूर कराने का भरोसा दिलाकर महिला से कई किश्तों में बड़ी रकम वसूल ली। जब लंबे समय तक कोई अनुदान स्वीकृत नहीं हुआ, तब पीड़िता को अपने साथ हुई कथित धोखाधड़ी का एहसास हुआ और उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
पुलिस के अनुसार, आरोपी की पहचान अमोल कृष्णा चव्हाण के रूप में हुई है, जो पुणे के बिबवेवाड़ी क्षेत्र के अपर इंदिरानगर का निवासी है। शिकायत के आधार पर उसके खिलाफ धोखाधड़ी और विश्वासघात से संबंधित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है। मामले की जांच जारी है।
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शिकायतकर्ता महिला, जिसकी उम्र 35 वर्ष बताई गई है, बिबवेवाड़ी क्षेत्र की एक आवासीय सोसायटी में रहती है। पुलिस जांच में सामने आया है कि महिला और आरोपी की पहचान लगभग तीन वर्ष पहले हुई थी। इसी दौरान आरोपी ने स्वयं को विभिन्न सरकारी योजनाओं और अनुदान प्रक्रियाओं की जानकारी रखने वाला प्रभावशाली व्यक्ति बताते हुए महिला से संपर्क बढ़ाया।
आरोप है कि अमोल चव्हाण ने महिला को नया उद्योग-व्यवसाय शुरू करने के लिए सरकारी सहायता और वित्तीय अनुदान उपलब्ध कराने का प्रस्ताव दिया। उसने दावा किया कि उसकी संस्था के माध्यम से सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से दिलाया जा सकता है और आवश्यक मंजूरी भी जल्द प्राप्त हो जाएगी। कथित तौर पर इसी भरोसे के आधार पर महिला को संगठन के कार्यालय में कई बार बुलाया गया और उसका विश्वास जीता गया।
जांच के अनुसार, आरोपी ने अनुदान आवेदन, दस्तावेजी प्रक्रिया, स्वीकृति शुल्क और अन्य प्रशासनिक खर्चों का हवाला देकर महिला से समय-समय पर धनराशि ली। यह रकम नकद और ऑनलाइन दोनों माध्यमों से ली गई। तीन वर्षों की अवधि में महिला से कुल ₹40 लाख वसूले जाने का आरोप है।
पीड़िता को लंबे समय तक यह विश्वास दिलाया जाता रहा कि उसकी फाइल विभिन्न सरकारी विभागों में प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में है और जल्द ही अनुदान जारी कर दिया जाएगा। हर बार किसी न किसी तकनीकी कारण, दस्तावेजी औपचारिकता या प्रशासनिक प्रक्रिया का हवाला देकर मामले को टाल दिया गया। इसी बीच महिला लगातार धनराशि देती रही।
हालांकि समय बीतने के बावजूद न तो कोई सरकारी अनुदान स्वीकृत हुआ और न ही व्यवसायिक सहायता से जुड़ा कोई आधिकारिक दस्तावेज उपलब्ध कराया गया। इसके बाद महिला को संदेह हुआ और उसने मामले की स्वतंत्र रूप से जानकारी जुटाने का प्रयास किया। प्रारंभिक पड़ताल में कथित अनियमितताएं सामने आने के बाद उसने पुलिस का रुख किया।
शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने उपलब्ध दस्तावेजों, बैंकिंग लेनदेन और अन्य साक्ष्यों की जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि यह पता लगाया जा रहा है कि आरोपी ने वास्तव में किसी सरकारी योजना के नाम पर धनराशि ली थी या पूरी योजना शुरुआत से ही धोखाधड़ी के उद्देश्य से बनाई गई थी। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि क्या अन्य लोग भी इसी तरह के झांसे का शिकार हुए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि रोजगार, उद्योग और सरकारी अनुदान से जुड़ी योजनाओं के नाम पर ठगी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे मामलों में आरोपी अक्सर सरकारी संपर्क, विशेष प्रभाव या त्वरित मंजूरी का दावा कर लोगों का विश्वास जीतते हैं। कई बार पीड़ित लंबे समय तक प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद में धनराशि देते रहते हैं, जिससे नुकसान बढ़ता जाता है।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि चाहे ऑनलाइन ठगी हो या वित्तीय धोखाधड़ी, अपराधी सबसे पहले भरोसा जीतने की रणनीति अपनाते हैं। वे लोगों की जरूरतों और अपेक्षाओं को समझकर उन्हें झूठे आश्वासन देते हैं और धीरे-धीरे आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं।
पुणे का यह मामला एक बार फिर बताता है कि सरकारी योजनाओं, अनुदान और निवेश संबंधी प्रस्तावों पर भरोसा करने से पहले आधिकारिक स्रोतों से सत्यापन करना कितना आवश्यक है। जांच एजेंसियां अब मामले से जुड़े वित्तीय लेनदेन और अन्य संभावित पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं।
