पुणे। साइबर ठगी के नए और खतरनाक रूप ‘डिजिटल अरेस्ट’ का एक और मामला सामने आया है, जहां ठगों ने एक 62 वर्षीय महिला को कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर उसकी जीवनभर की जमा पूंजी ठग ली। करीब एक महीने तक चले इस सुनियोजित धोखाधड़ी में महिला से ₹69 लाख की राशि अलग-अलग ट्रांजैक्शनों के जरिए ट्रांसफर कराई गई। मामला सामने आने के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि साइबर अपराधी किस तरह मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर लोगों को अपने जाल में फंसा रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, घटना की शुरुआत 13 फरवरी को एक अज्ञात नंबर से आए फोन कॉल से हुई। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) का अधिकारी बताया और महिला को सूचित किया कि उसके आधार कार्ड का इस्तेमाल कर एक सिम कार्ड जारी किया गया है, जिसका उपयोग कथित तौर पर आपत्तिजनक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। इसके साथ ही यह भी दावा किया गया कि उसके नाम पर एक बैंक खाता खोला गया है, जो मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा हुआ है।
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इसके बाद ठगों ने महिला पर दबाव बढ़ाते हुए कहा कि उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो चुका है और उसे कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता है। इस पूरे घटनाक्रम को विश्वसनीय बनाने के लिए ठगों ने खुद को “क्राइम ब्रांच” का अधिकारी बताकर महिला से संपर्क जारी रखा। लगातार कॉल और कथित आधिकारिक भाषा का इस्तेमाल कर उन्होंने महिला को यह यकीन दिला दिया कि मामला गंभीर है और उसे तुरंत सहयोग करना होगा।
ठगों ने महिला को बताया कि उसके बैंक खातों की “जांच” चल रही है और सत्यापन प्रक्रिया पूरी करने के लिए उसे अपनी राशि एक विशेष खाते में ट्रांसफर करनी होगी। उसे भरोसा दिलाया गया कि जांच पूरी होते ही पूरी रकम वापस कर दी जाएगी। गिरफ्तारी के डर और कानूनी कार्रवाई की आशंका के चलते महिला ने निर्देशों का पालन किया और अलग-अलग चरणों में पैसे ट्रांसफर करती रही।
करीब एक महीने तक चले इस साइबर जाल में महिला ने मार्च के दूसरे सप्ताह तक अपनी लगभग पूरी बचत—₹69 लाख—ठगों को दे दी। जब काफी समय बीत जाने के बाद भी रकम वापस नहीं आई, तो महिला को शक हुआ और उसने कथित अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की। इस पर ठगों ने उसे स्थानीय थाने से ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) लाने की सलाह दी।
17 मार्च को महिला अपने परिजन के साथ थाने पहुंची, जहां उसे पता चला कि वह एक संगठित साइबर ठगी का शिकार हो चुकी है। इसके बाद मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई।
साइबर अपराध के जानकारों का कहना है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों में अपराधी कानून प्रवर्तन एजेंसियों का नाम लेकर लोगों को मानसिक रूप से कमजोर करते हैं। “प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह” के अनुसार, ऐसे मामलों में ठग ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का सहारा लेते हैं, जहां डर, दबाव और जल्दबाजी का माहौल बनाकर पीड़ित से बिना सोचे-समझे फैसले कराए जाते हैं।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि कोई भी सरकारी एजेंसी या जांच संस्था फोन कॉल या ऑनलाइन माध्यम से किसी व्यक्ति को पैसे ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती। ऐसे मामलों में सतर्क रहना और किसी भी संदिग्ध कॉल की पुष्टि आधिकारिक माध्यमों से करना बेहद जरूरी है।
यह घटना इस बात की गंभीर चेतावनी है कि साइबर अपराध अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी लोगों को निशाना बना रहा है। ऐसे में जागरूकता और सतर्कता ही इस तरह की ठगी से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है।
