पेपर लीक और परीक्षा घोटालों पर सख्ती के लिए संशोधन विधेयक में केंद्र को STF जांच की शक्ति देने का प्रस्ताव किया गया है।

परीक्षा घोटालों पर शिकंजा कसने की तैयारी: केंद्र को मिलेगी STF जांच की शक्ति, राज्यों के अधिकारों पर उठे सवाल

Team The420
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नई दिल्ली: देशभर में परीक्षा पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर सख्ती लाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया है। प्रस्तावित कानून में परीक्षा संबंधी अपराधों की जांच के लिए केंद्र सरकार को स्पेशल टास्क फोर्स (STF) गठित करने का अधिकार देने का प्रावधान किया गया है। हालांकि, इस प्रावधान को लेकर शिक्षा विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने संघीय ढांचे तथा राज्यों के अधिकारों पर असर पड़ने की आशंका जताई है।

प्रस्तावित संशोधन के अनुसार यदि केंद्र सरकार किसी परीक्षा में अनियमितता या पेपर लीक के मामले की जांच के लिए STF गठित करती है, तो उस मामले की जांच किसी राज्य एजेंसी द्वारा नहीं की जा सकेगी। मौजूदा कानून में जांच का अधिकार पुलिस उपाधीक्षक या सहायक पुलिस आयुक्त से कम रैंक के अधिकारी को नहीं दिया जा सकता था, जबकि केंद्र सरकार आवश्यकता पड़ने पर किसी केंद्रीय जांच एजेंसी को मामला सौंप सकती थी। नए संशोधन में STF का प्रावधान जोड़कर केंद्र की भूमिका और अधिक मजबूत करने का प्रयास किया गया है।

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शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि कानून-व्यवस्था संविधान के अनुसार राज्य सूची का विषय है। ऐसे में यदि केंद्र किसी राज्य सरकार या राज्य विश्वविद्यालय की परीक्षा में कथित अनियमितता की जांच के लिए सीधे STF गठित कर देता है, तो संबंधित राज्य की जांच संबंधी संवैधानिक भूमिका सीमित हो सकती है। कुछ विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि भविष्य में इस प्रावधान का राजनीतिक उपयोग भी किया जा सकता है, विशेषकर विपक्ष शासित राज्यों में परीक्षा विवादों के मामलों में।

वर्तमान व्यवस्था में किसी राज्य में सीबीआई जांच सामान्यतः राज्य सरकार की सहमति या उच्च न्यायालय अथवा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर ही होती है। लेकिन प्रस्तावित संशोधन के तहत केंद्र सरकार राज्य सरकार की अनुमति के बिना भी परीक्षा संबंधी मामलों में STF जांच का आदेश दे सकेगी। यही प्रावधान बहस का सबसे बड़ा विषय बनकर उभरा है।

यह विधेयक हाल के वर्षों में सामने आए कई बड़े पेपर लीक मामलों और छात्रों के व्यापक विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में लाया गया है। सरकार का कहना है कि सार्वजनिक परीक्षाओं की पारदर्शिता बनाए रखने और संगठित परीक्षा माफिया पर प्रभावी कार्रवाई के लिए कानून को और कठोर बनाना आवश्यक है।

संशोधन विधेयक में परीक्षा संबंधी कदाचार की 15 श्रेणियां निर्धारित की गई हैं। इनमें प्रश्नपत्र लीक करना, ओएमआर शीट से छेड़छाड़, फर्जी वेबसाइट बनाना, नकली प्रवेश पत्र जारी करना और अन्य संगठित धोखाधड़ी के तरीके शामिल हैं। सरकार का उद्देश्य परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े हर स्तर पर होने वाली अनियमितताओं को कानून के दायरे में लाना है।

विधेयक के तहत सजा और जुर्माने में भी उल्लेखनीय वृद्धि का प्रस्ताव है। व्यक्तिगत स्तर पर परीक्षा धोखाधड़ी करने वालों के लिए जेल की सजा तीन से पांच वर्ष के स्थान पर पांच से दस वर्ष तक करने और अधिकतम जुर्माना ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹50 लाख करने का प्रस्ताव है। परीक्षा संचालन से जुड़े सेवा प्रदाताओं के लिए जुर्माना ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹4 करोड़ तथा सार्वजनिक परीक्षाओं से प्रतिबंध की अवधि चार वर्ष से बढ़ाकर आठ वर्ष करने का प्रस्ताव रखा गया है।

यदि किसी सेवा प्रदाता के निदेशक, वरिष्ठ प्रबंधन या जिम्मेदार अधिकारी की सहमति से अपराध किया जाता है, तो उनके लिए न्यूनतम सजा पांच वर्ष और जुर्माना ₹5 करोड़ तक हो सकता है। वहीं यदि परीक्षा प्राधिकरण या किसी संगठित गिरोह द्वारा बड़े स्तर पर परीक्षा अपराध किया जाता है, तो न्यूनतम सजा सात वर्ष और न्यूनतम जुर्माना ₹10 करोड़ तक निर्धारित करने का प्रस्ताव किया गया है।

विधेयक में मामलों के त्वरित निपटारे पर भी जोर दिया गया है। इसके तहत प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में विशेष फास्ट-ट्रैक अदालत नामित की जाएगी। जांच दो महीने के भीतर पूरी करने और उसके बाद तीन महीने के भीतर मुकदमे का निपटारा करने का लक्ष्य रखा गया है।

हालांकि, कई शिक्षाविदों का मानना है कि केवल सजा बढ़ाने से पेपर लीक की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। उनका कहना है कि परीक्षा संचालन संस्थाओं को अधिक स्वायत्त, जवाबदेह और पेशेवर बनाना होगा, ताकि प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, डिजिटल निगरानी और प्रशासनिक पारदर्शिता को मजबूत कर संगठित परीक्षा माफिया पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सके।

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