पुणे (महाराष्ट्र): साइबर ठगी की घटनाओं में इस्तेमाल होने वाले बैंक खातों के नेटवर्क को तोड़ने के लिए पिंपरी-चिंचवड़ पुलिस ने बड़ा अभियान शुरू किया है। Operation Mule Hunt के तहत पुलिस उन लोगों और संस्थाओं की पहचान कर रही है, जिनके बैंक खाते कथित तौर पर ऑनलाइन फ्रॉड से जुटाई गई रकम को जमा करने और आगे पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किए गए। जांच एजेंसियों का कहना है कि साइबर अपराधियों की असली वित्तीय रीढ़ म्यूल अकाउंट नेटवर्क है, जिसे खत्म किए बिना बड़े साइबर गिरोहों पर प्रभावी कार्रवाई मुश्किल है।
पुलिस जांच में सामने आया है कि साइबर अपराधी अपने नाम से बैंक खाते इस्तेमाल करने से बचते हैं। इसके बजाय वे बेरोजगार युवाओं, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों या लालच में आए व्यक्तियों को कमीशन और आसान कमाई का झांसा देकर उनके बैंक खाते हासिल करते हैं। कई मामलों में एटीएम कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी और खातों से जुड़े मोबाइल नंबर तक अपराधियों को उपलब्ध करा दिए जाते हैं।
जांचकर्ताओं के अनुसार, कुछ मामलों में छोटे कारोबार, वेब डेवलपमेंट कंपनियों और रियल एस्टेट फर्मों के नाम पर खोले गए बैंक खाते भी संदिग्ध गतिविधियों में सामने आए हैं। इनमें से कई संस्थाएं केवल कागजों पर मौजूद थीं और उनका वास्तविक कारोबार नहीं था, लेकिन उनके खातों से लाखों रुपये के लेन-देन हुए।
करोड़ों के लेन-देन की जांच
पुलिस ने गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) और अन्य वित्तीय खुफिया जानकारी के आधार पर संदिग्ध खातों की पहचान की है। अधिकारियों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में साइबर अपराध शिकायतों से जुड़े लेन-देन के आधार पर कई मामले दर्ज किए गए हैं।
एक मामले में किराना कारोबार के नाम पर खोले गए बैंक खाते में कथित तौर पर करीब ₹94 लाख जमा हुए, जिन्हें 11 दिनों के भीतर निकाल लिया गया। जांच में यह खाता देश के पांच राज्यों में दर्ज 13 साइबर अपराध शिकायतों से जुड़ा पाया गया।
इसी तरह एक वेब डेवलपर के नाम से खोले गए बैंक खाते में तीन दिनों के भीतर करीब ₹55 लाख के संदिग्ध साइबर अपराध संबंधी लेन-देन सामने आए। वहीं, एक ऐसी रियल एस्टेट कंपनी के खाते में करीब ₹20 लाख का लेन-देन मिला, जिसके सक्रिय कारोबार में होने के प्रमाण नहीं मिले हैं।
साइबर फ्रॉड की पूरी चेन पर कार्रवाई की तैयारी
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि म्यूल अकाउंट अब केवल व्यक्तिगत स्तर पर होने वाले अपराध का हिस्सा नहीं रह गए हैं, बल्कि संगठित साइबर अपराध नेटवर्क की वित्तीय व्यवस्था बन चुके हैं। इसी वजह से पुलिस ने ऐसे मामलों में संगठित अपराध से जुड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई शुरू की है।
जांच एजेंसियां अब केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहना चाहतीं जिसके खाते में ठगी की रकम पहुंची, बल्कि पूरे नेटवर्क को निशाना बनाने की तैयारी कर रही हैं। इसमें बैंक खाते उपलब्ध कराने वाले लोग, बिचौलिए, फर्जी कंपनियां बनाने वाले और रकम को नियंत्रित करने वाले मुख्य आरोपी शामिल हैं।
फर्जी कंपनियों के जरिए बड़ी रकम की हेराफेरी
जांच में यह भी सामने आया है कि साइबर अपराधी कई बार लोगों के पहचान दस्तावेजों का इस्तेमाल कर फर्जी कंपनियां और शेल फर्म बनाते हैं। इन कंपनियों के नाम पर करंट अकाउंट खोले जाते हैं, जिनमें बड़ी रकम का लेन-देन किया जा सकता है।
पुलिस अब बैंक रिकॉर्ड, कंपनी पंजीकरण दस्तावेज, डिजिटल ट्रेल और वित्तीय गतिविधियों की जांच कर रही है ताकि उन लोगों तक पहुंचा जा सके जो पर्दे के पीछे से इस नेटवर्क को संचालित कर रहे हैं।
आसान कमाई के लालच से बचने की अपील
पुलिस ने नागरिकों को चेतावनी दी है कि वे अपने बैंक खाते किराये पर देने, बेचने या किसी अन्य व्यक्ति को संचालित करने की अनुमति न दें। साइबर अपराधी अक्सर कंपनी भुगतान, जीएसटी रिफंड, ऑनलाइन गेमिंग कमाई या लोन प्रक्रिया के नाम पर बैंक खाते इस्तेमाल करने का झांसा देते हैं।
अधिकारियों ने कहा कि ऐसे खाताधारक भी कानूनी कार्रवाई का सामना कर सकते हैं, यदि उनके खाते का इस्तेमाल साइबर ठगी की रकम को छिपाने या ट्रांसफर करने में हुआ हो।
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक साइबर अपराधों से मुकाबला अब केवल डिजिटल जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि अपराधियों की वित्तीय व्यवस्था को तोड़ना भी उतना ही जरूरी हो गया है। Operation Mule Hunt इसी रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए पुलिस साइबर ठगी के पीछे काम कर रहे आर्थिक नेटवर्क को खत्म करने की कोशिश कर रही है।
