₹88 लाख की गड़बड़ी उजागर होने के बाद ‘जीरो थर्ड पार्टी’ नीति लागू; दवाओं और इम्प्लांट की खरीद अब सीधे सिस्टम से होगी

आयुष्मान घोटाले के बाद बड़ा सुधार: PGI Chandigarh ने बदली खरीद व्यवस्था

Roopa
By Roopa
5 Min Read

चंडीगढ़: देश की प्रमुख स्वास्थ्य संस्थाओं में शुमार PGI Chandigarh ने आयुष्मान योजना से जुड़े हालिया घोटाले के बाद अपनी खरीद (प्रोक्योरमेंट) प्रणाली में व्यापक बदलाव किए हैं। संस्थान ने ‘जीरो थर्ड पार्टी’ नीति लागू करते हुए अब मेडिकल उपकरणों, इम्प्लांट और दवाओं की खरीद में बिचौलियों की भूमिका पूरी तरह समाप्त करने का फैसला किया है।

यह कदम उस मामले के सामने आने के बाद उठाया गया है, जिसमें Ayushman Bharat योजना के तहत करीब ₹88 लाख की राशि फर्जी बिलों और मृत मरीजों के नाम पर ट्रांसफर कर दी गई थी। इस खुलासे ने अस्पताल की मौजूदा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे, जिसके बाद प्रशासन ने त्वरित सुधार की दिशा में कदम बढ़ाए।

बिचौलियों पर पूरी तरह रोक

नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी बाहरी विक्रेता को सीधे डॉक्टरों, अस्पताल स्टाफ या मरीजों के परिजनों से संपर्क करने की अनुमति नहीं होगी। पहले, ये विक्रेता इम्प्लांट और दवाओं की आपूर्ति में मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे, जिससे कीमतों में हेरफेर और फर्जी बिलिंग जैसी गड़बड़ियां सामने आती थीं।

अस्पताल प्रशासन का मानना है कि इस बदलाव से न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि उपचार की लागत को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी। अब सभी खरीद और आपूर्ति प्रक्रिया को संस्थान के आंतरिक सिस्टम के जरिए ही संचालित किया जाएगा।

डिजिटल सिस्टम से होगी हर लेनदेन की निगरानी

संस्थान ने एक सुरक्षित ऑनलाइन इंडेंटिंग सिस्टम लागू करने का निर्णय लिया है, जिसे अस्पताल के सूचना तंत्र से जोड़ा जाएगा। इस सिस्टम के तहत हर दवा और इम्प्लांट को मरीज की यूनिक आईडी और संबंधित डॉक्टर की अनुमति से लिंक किया जाएगा।

इससे पहले, मैनुअल रिकॉर्ड और कागजी प्रक्रिया के चलते फर्जी स्टांप, नकली दस्तावेज और गलत एंट्री के जरिए पैसे की हेराफेरी संभव हो पाती थी। नई डिजिटल प्रणाली रियल-टाइम ट्रैकिंग सुनिश्चित करेगी, जिससे किसी भी अनियमितता को तुरंत पकड़ा जा सकेगा।

‘मेडिसिन-रीसेल’ रैकेट पर भी प्रहार

जांच में यह भी सामने आया था कि कुछ मामलों में अस्पताल से जारी दवाएं बाहर दोबारा बेची जा रही थीं। इस ‘मेडिसिन-रीसेल’ रैकेट को खत्म करने के लिए अस्पताल अब मरीज के बेड तक सीधे दवा और इम्प्लांट पहुंचाने की व्यवस्था लागू कर रहा है।

इस नई प्रक्रिया में मरीज के परिजनों को बाहर जाकर दवाएं लाने की जरूरत नहीं होगी, जिससे फर्जी पर्चियों और बाहरी दुकानों के दुरुपयोग पर रोक लगेगी। इसके लिए अतिरिक्त स्टाफ की नियुक्ति भी की जा रही है, ताकि वितरण प्रणाली सुचारू रूप से चल सके।

FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference

आयुष्मान योजना में क्या है नियम

Ayushman Bharat योजना के तहत पात्र परिवारों को हर साल ₹5 लाख तक का मुफ्त इलाज मिलता है। हालांकि, ₹2,000 से अधिक कीमत की दवाओं के लिए डॉक्टर की पर्ची अनिवार्य होती है, जिसे कई स्तरों पर सत्यापित किया जाता है—जैसे डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, योजना काउंटर और डिस्पेंसरी।

इन्हीं प्रक्रियाओं में खामियों का फायदा उठाकर फर्जीवाड़ा किया गया था। अब नए सिस्टम में हर चरण को डिजिटल रूप से रिकॉर्ड किया जाएगा, जिससे मानवीय हस्तक्षेप कम होगा और जवाबदेही तय होगी।

स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ती निगरानी का संकेत

विशेषज्ञों का मानना है कि PGI Chandigarh का यह कदम देशभर के सरकारी अस्पतालों के लिए एक मॉडल बन सकता है। स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ती वित्तीय अनियमितताओं को देखते हुए डिजिटल निगरानी और पारदर्शी सिस्टम की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

यह बदलाव न केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि मरीजों के विश्वास को बहाल करने में भी अहम भूमिका निभाएगा।

निष्कर्ष

आयुष्मान घोटाले के बाद उठाए गए ये कदम दर्शाते हैं कि स्वास्थ्य संस्थान अब पारंपरिक प्रक्रियाओं से आगे बढ़कर तकनीक आधारित पारदर्शिता की ओर बढ़ रहे हैं। PGI Chandigarh की नई व्यवस्था जहां सिस्टम की कमजोरियों को दूर करने का प्रयास है, वहीं यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक चेतावनी भी है कि अब जवाबदेही और निगरानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हमसे जुड़ें

Share This Article