नई दिल्ली: National Company Law Tribunal (NCLT) ने IL&FS घोटाले से जुड़े मामले में ऑडिट फर्मों की जवाबदेही तय करने की दिशा में अहम आदेश दिया है। ट्रिब्यूनल ने Deloitte, BSR & Associates और SRBC & Co LLP के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दे दी है, जिससे इन फर्मों की भूमिका की विस्तृत जांच का रास्ता साफ हो गया है।
यह आदेश 24 मार्च को पारित किया गया, जिसमें ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि “वॉचडॉग” की भूमिका निभाने वाले ऑडिटर्स खुद को जांच से बाहर नहीं रख सकते। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि किसी भी फर्म की जिम्मेदारी स्वतः तय नहीं होगी, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या उनके खिलाफ “जानबूझकर शामिल होने” के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं।
मामला Infrastructure Leasing & Financial Services (IL&FS) में कथित वित्तीय अनियमितताओं और गवर्नेंस फेल्योर से जुड़ा है, जिसके बाद केंद्र सरकार ने 2018 में व्यापक कार्रवाई शुरू की थी। यह कार्यवाही कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 241, 242 और विशेष रूप से धारा 339 के तहत चल रही है, जो धोखाधड़ीपूर्ण तरीके से कारोबार चलाने के मामलों में जिम्मेदारी तय करने का प्रावधान करती है।
ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा कि धारा 339 का दायरा केवल कंपनी के अंदरूनी अधिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ऐसे बाहरी पक्ष भी शामिल हो सकते हैं, जो कथित धोखाधड़ी में शामिल या सहयोगी रहे हों। इस व्याख्या के साथ, ऑडिट फर्मों और अन्य तीसरे पक्षों को शुरुआती चरण में ही बाहर करने की मांग को खारिज कर दिया गया।
सरकार ने अपने पक्ष में तर्क दिया था कि IL&FS मामले में ऑडिटर्स और अन्य पेशेवर इकाइयों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और हर पक्ष की जिम्मेदारी का आकलन केस-दर-केस आधार पर होना चाहिए। साथ ही, Serious Fraud Investigation Office (SFIO) की जांच रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों के आधार पर साक्ष्यों का मूल्यांकन जरूरी है।
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ट्रिब्यूनल ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि किसी भी पक्ष को बिना जांच के छूट नहीं दी जा सकती। हालांकि, उसने यह भी स्पष्ट किया कि केवल ऑडिटर होने के नाते किसी फर्म को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी होगा कि संबंधित पक्ष को कथित धोखाधड़ी की जानकारी थी या उसने सक्रिय रूप से उसमें भागीदारी की।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश ऑडिट फर्मों के लिए जोखिम को काफी बढ़ा सकता है। अब इन कंपनियों को अदालत में अपनी भूमिका का बचाव तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर करना होगा। साथ ही, यह आदेश भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल बन सकता है, जहां नियामक संस्थाएं कंपनी प्रबंधन से आगे बढ़कर बाहरी पेशेवरों की जवाबदेही तय करने की कोशिश करेंगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला कॉर्पोरेट गवर्नेंस के ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि अगर किसी भी पेशेवर संस्था की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है, तो उसे जांच और संभावित कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।
ट्रिब्यूनल के इस फैसले का असर आने वाले समय में अन्य कॉर्पोरेट धोखाधड़ी मामलों पर भी पड़ सकता है। खासकर जटिल कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर और मल्टी-लेयर ट्रांजेक्शन वाले मामलों में, यह आदेश नियामकों को व्यापक अधिकार देता है कि वे सभी संबंधित पक्षों की भूमिका की जांच कर सकें।
धारा 339 के तहत, अगर यह साबित हो जाता है कि किसी व्यक्ति या संस्था ने जानबूझकर धोखाधड़ी में भाग लिया है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से नुकसान की भरपाई के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। ऐसे में इस मामले में आगे की जांच और साक्ष्यों की भूमिका बेहद अहम होगी, जो तय करेगी कि किन-किन पक्षों पर कार्रवाई होगी।
इस आदेश के साथ ही IL&FS केस एक बार फिर केंद्र में आ गया है और कॉर्पोरेट दुनिया में ऑडिटर्स की भूमिका और जवाबदेही को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
