जाली नियुक्ति आदेश और फर्जी शालार्थ आईडी के जरिए सरकारी खजाने से वेतन निकासी का आरोप; पांचवीं गिरफ्तारी के बाद कई जिलों में फैले नेटवर्क की जांच तेज

₹160 करोड़ फर्जी शालार्थ आईडी घोटाला: सेवानिवृत्त शिक्षा अधिकारी गिरफ्तार, जांच के घेरे में 1,200 से अधिक लोग

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By Roopa
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नासिक: महाराष्ट्र के चर्चित ₹160 करोड़ के कथित फर्जी शालार्थ आईडी घोटाले में नासिक पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक सेवानिवृत्त माध्यमिक शिक्षा अधिकारी को गिरफ्तार किया है। इस गिरफ्तारी के साथ ही मामले में अब तक कुल पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। जांच एजेंसियों का आरोप है कि फर्जी नियुक्ति आदेश, जाली शालार्थ आईडी और सरकारी अभिलेखों में कथित हेरफेर के माध्यम से शिक्षकों एवं गैर-शिक्षकीय कर्मचारियों के नाम पर वर्षों तक वेतन और बकाया राशि जारी कर सरकारी खजाने को भारी वित्तीय नुकसान पहुंचाया गया। पुलिस अब इस कथित नेटवर्क से जुड़े अन्य अधिकारियों, स्कूल प्रबंधन और लाभार्थियों की भूमिका की भी जांच कर रही है।

गिरफ्तार आरोपी की पहचान 66 वर्षीय शशिकांत हिंगोणीकर के रूप में हुई है, जो जलगांव निवासी हैं और वर्ष 2011 से 2015 के बीच जलगांव जिला परिषद में माध्यमिक शिक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत रहे थे। पुलिस के अनुसार, उनके कार्यकाल के दौरान 259 शिक्षकीय और गैर-शिक्षकीय कर्मचारियों के पक्ष में कथित तौर पर व्यक्तिगत स्वीकृति आदेश जारी किए गए, जबकि शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड में इन नियुक्तियों से संबंधित कोई आधिकारिक प्रस्ताव या आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं मिले।

पुलिस के अनुसार, इस घोटाले का खुलासा मार्च 2025 में नासिक रोड पुलिस थाने में दर्ज शिकायत के बाद हुआ था। जांच के दौरान सामने आया कि फर्जी शालार्थ आईडी तैयार कर सरकारी कोष से वेतन और एरियर का भुगतान कराया गया। प्रारंभिक जांच में अनुमान लगाया गया है कि इस कथित धोखाधड़ी से राज्य सरकार को लगभग ₹160 करोड़ का वित्तीय नुकसान हुआ।

जांच एजेंसियों के मुताबिक, अब तक एकत्र साक्ष्यों से संकेत मिले हैं कि नासिक, जलगांव, धुले और नंदुरबार जिलों में 841 शिक्षकीय एवं गैर-शिक्षकीय कर्मचारियों को कथित रूप से पिछली तारीखों से अवैध नियुक्तियां दर्शाई गईं। इसके बाद फर्जी स्वीकृति आदेशों के आधार पर शालार्थ आईडी तैयार कर वेतन और बकाया राशि जारी की गई। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इस पूरी प्रक्रिया में किन-किन अधिकारियों, कर्मचारियों और संस्थानों की भूमिका रही।

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क्राइम ब्रांच ने तकनीकी निगरानी और खुफिया सूचनाओं के आधार पर आरोपी का पता लगाकर धुले से गिरफ्तार किया। अदालत में पेश किए जाने के बाद उसे पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है। जांच अधिकारी अब आरोपी से पूछताछ कर कथित नेटवर्क की कार्यप्रणाली, दस्तावेज तैयार करने वाले लोगों और वित्तीय लेनदेन की श्रृंखला की जानकारी जुटा रहे हैं।

पुलिस के अनुसार, मामले की जांच का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। अब तक करीब 1,200 लोग जांच के दायरे में आ चुके हैं। इनमें स्कूलों के प्रधानाचार्य, ट्रस्टी, पूर्व उप शिक्षा निदेशक, शिक्षा अधिकारी, वेतन अधीक्षक तथा अन्य संबंधित कर्मचारी शामिल हैं। जांच एजेंसियां विभागीय रिकॉर्ड, नियुक्ति फाइलों, वेतन भुगतान विवरण, डिजिटल डेटा और अन्य दस्तावेजों का मिलान कर यह पता लगा रही हैं कि किन मामलों में नियमों का उल्लंघन हुआ और किस स्तर पर कथित फर्जीवाड़ा किया गया।

Future Crime Research Foundation (FCRF) के साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े वित्तीय और दस्तावेजी धोखाधड़ी के मामलों में अब अपराधी पारंपरिक जालसाजी के साथ डिजिटल रिकॉर्ड, पहचान प्रबंधन प्रणाली और सरकारी डेटाबेस में हेरफेर जैसी तकनीकों का भी सहारा लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों की रोकथाम के लिए विभागों के बीच रियल-टाइम डेटा सत्यापन, डिजिटल ऑडिट ट्रेल, नियमित फोरेंसिक ऑडिट और संवेदनशील सरकारी प्रणालियों की निरंतर निगरानी बेहद आवश्यक है। उनका कहना है कि नियुक्ति, वेतन स्वीकृति और डिजिटल पहचान से जुड़ी प्रत्येक प्रक्रिया में बहु-स्तरीय सत्यापन व्यवस्था लागू करने से इस प्रकार के संगठित वित्तीय घोटालों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।

पुलिस का कहना है कि मामले की जांच अभी जारी है और डिजिटल साक्ष्यों, विभागीय अभिलेखों, वित्तीय दस्तावेजों तथा संबंधित अधिकारियों की भूमिका का विस्तृत विश्लेषण किया जा रहा है। यदि जांच में अन्य व्यक्तियों या संस्थानों की संलिप्तता सामने आती है तो आगे और गिरफ्तारियां तथा कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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