मुंबई: मुंबई क्राइम ब्रांच ने करीब ₹500 करोड़ के कथित साइबर फ्रॉड नेटवर्क का खुलासा करते हुए 12 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, आरोपी पिछले छह से आठ महीनों में गोवा से करीब ₹500 करोड़ के संदिग्ध लेनदेन को प्रोसेस कर चुके थे। जांच में इस नेटवर्क के तार दुबई से संचालित कथित अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट से जुड़े होने की आशंका सामने आई है। गिरफ्तार किए गए सभी आरोपी 20 से 25 वर्ष की उम्र के हैं और उन्हें 11 अगस्त तक पुलिस हिरासत में भेजा गया है।
जांच के दौरान सामने आया कि नेटवर्क के लिए मुंबई में बैंक खाते कथित तौर पर खोले जाते थे। इन खातों से जुड़े बैंकिंग दस्तावेज और अन्य सामग्री बस के जरिए गोवा भेजी जाती थी। इसके बाद खातों का इस्तेमाल रकम जमा करने, नकद निकासी और अलग-अलग बैंक खातों के बीच धनराशि ट्रांसफर करने के लिए किया जाता था। पुलिस के मुताबिक, आरोपी कैलंगुट बीच के पास ‘केस डी निकोल विला’ नाम की किराये की दो मंजिला विला से अपना संचालन कर रहे थे।
गिरफ्तार आरोपियों में ज्यादातर युवकों की भर्ती गुजरात के अहमदाबाद और राजकोट से किए जाने की जानकारी सामने आई है। पुलिस के अनुसार, उन्हें गोवा भेजने से पहले 10 से 15 दिनों का प्रशिक्षण दिया गया था। कथित नेटवर्क में काम करने के बदले आरोपियों को हर महीने ₹30,000 वेतन और लेनदेन की राशि पर 3 प्रतिशत कमीशन मिलता था। जांचकर्ताओं को आशंका है कि युवाओं को बैंकिंग और डिजिटल लेनदेन की तकनीकी प्रक्रिया सिखाकर उन्हें मनी ट्रांसफर ऑपरेशन में लगाया गया था।
पुलिस के मुताबिक, आरोपी ‘100 Panel’ और ‘Rudra’ जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते थे। इन माध्यमों के जरिए ऑनलाइन गेमिंग और साइबर अपराधों से जुड़ी रकम को विभिन्न बैंक खातों में भेजे जाने का आरोप है। जांच में डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराधों से हासिल रकम के नेटवर्क में पहुंचने की आशंका भी जताई गई है। आरोपी अपने लैपटॉप और मोबाइल फोन के जरिए बैंक खातों को संचालित करते थे और रकम की निकासी तथा ट्रांसफर की प्रक्रिया को नियंत्रित करते थे।
क्राइम ब्रांच ने विला पर कार्रवाई के दौरान 15 लैपटॉप, 128 ATM कार्ड, 89 मोबाइल फोन, 76 SIM कार्ड, 22 चेकबुक, 77 पासबुक, छह राउटर, तीन कीबोर्ड और दो माउस बरामद किए। पुलिस को आरोपियों द्वारा कथित तौर पर सभी लेनदेन का हिसाब रखने के लिए एक अलग लेजर बनाए जाने की जानकारी भी मिली है। जांचकर्ताओं का मानना है कि यह रिकॉर्ड नेटवर्क में धन के प्रवाह और इससे जुड़े अन्य खातों की पहचान करने में अहम साबित हो सकता है।
पुलिस के अनुसार, नेटवर्क से जुड़े बैंक खातों में मौजूद करीब ₹15 करोड़ से ₹100 करोड़ तक की रकम फ्रीज की जा चुकी है या फ्रीज करने की प्रक्रिया जारी है। कुछ जब्त खातों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों से साइबर फ्रॉड की 83 शिकायतें साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर दर्ज मिली हैं। इससे पुलिस को आशंका है कि यह नेटवर्क केवल एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं था और इसके जरिए अलग-अलग राज्यों में साइबर अपराध से प्राप्त रकम को घुमाया जा रहा था।
प्रारंभिक मामला पायधोनी पुलिस थाने में दर्ज किया गया था। बाद में गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के जरिए नेटवर्क के ऊपरी स्तर पर मौजूद लोगों और मुख्य संचालकों तक पहुंचने की कोशिश शुरू की गई। पुलिस अब बैंक खातों के स्रोत, लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरणों की खरीद तथा आरोपियों के विदेशी संपर्कों की जांच कर रही है। जब्त उपकरणों की फॉरेंसिक जांच से भी नेटवर्क के बारे में अतिरिक्त जानकारी मिलने की उम्मीद है।
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के मुताबिक, ऐसे नेटवर्क में युवाओं को सीमित अवधि का प्रशिक्षण देकर बैंक खातों, डिजिटल उपकरणों और लेनदेन की जिम्मेदारी दी जाती है, जबकि वास्तविक संचालक पर्दे के पीछे रहते हैं। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में बैंक खाते, ATM कार्ड, SIM और डिजिटल उपकरणों की बरामदगी यह संकेत देती है कि मामला केवल खातों के दुरुपयोग तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि संगठित मनी-म्यूल नेटवर्क की व्यापक जांच जरूरी है।
आरोपियों को स्थानीय अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 11 अगस्त 2026 तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि ₹500 करोड़ के कथित लेनदेन में कितनी रकम साइबर अपराध से आई, किन खातों में भेजी गई और दुबई स्थित कथित सिंडिकेट से इसका वास्तविक संपर्क किस स्तर पर था।
