मुंबई: भारत में कॉर्पोरेट कंपनियों को निशाना बनाने वाले एक नए साइबर अपराध मॉडल ‘बॉस स्कैम’ का बड़ा खुलासा हुआ है। मुंबई पुलिस ने एक ऐसे संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया है जिसने एक प्रतिष्ठित कंपनी के डिप्टी जनरल मैनेजर को वरिष्ठ अधिकारी बनकर व्हाट्सएप पर निर्देश दिए और 13 दिनों के भीतर 63 अलग-अलग बैंक ट्रांजैक्शन के जरिए ₹10.40 करोड़ विभिन्न खातों में ट्रांसफर करा लिए। मामले में अब तक छह आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि गिरोह के मास्टरमाइंड और अन्य सदस्यों की तलाश जारी है।
पुलिस के अनुसार पीड़ित अधिकारी को 3 जून को व्हाट्सएप पर एक नए नंबर से संदेश मिला। संदेश भेजने वाले ने खुद को कंपनी का वरिष्ठ अधिकारी बताया और दावा किया कि यह उनका निजी नंबर है। प्रोफाइल फोटो और नाम वास्तविक अधिकारी जैसा होने के कारण पीड़ित को कोई संदेह नहीं हुआ। आरोपी ने यह भी कहा कि वह लगातार बैठकों में रहेगा, इसलिए कॉल न करने की सलाह दी।
इसके बाद आरोपी ने कंपनी के खाते से अलग-अलग बैंक खातों में धनराशि भेजने के निर्देश देने शुरू किए। पीड़ित ने निर्देशों को वास्तविक मानते हुए 3 से 15 जून के बीच 63 ट्रांजैक्शन में कुल ₹10,40,71,924 ट्रांसफर कर दिए। धोखाधड़ी का खुलासा तब हुआ जब लेखा संबंधी दस्तावेज मांगने पर वास्तविक अधिकारी ने ऐसे किसी निर्देश से इनकार कर दिया।
जांच के दौरान दिल्ली में दो संदिग्ध युवकों को उनके बैंक खातों से बड़ी नकद निकासी की कोशिश करते समय पकड़ा गया। पूछताछ में उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने कमीशन के बदले अपने बैंक खाते साइबर गिरोह को उपलब्ध कराए थे। इनके खुलासे के आधार पर एक अन्य हैंडलर सहित कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। बाद में जांच मुंबई पुलिस को सौंपी गई और कुल छह आरोपियों की गिरफ्तारी हुई।
जांच एजेंसियों के अनुसार आरोपियों ने केवल म्यूल अकाउंट का उपयोग ही नहीं किया, बल्कि जांच से बचने के लिए चोरी की रकम को वैध दिखाने का नया तरीका भी अपनाया। पहले धनराशि म्यूल खातों में भेजी गई, फिर विभिन्न राज्यों के प्रतिष्ठित ज्वेलरी शोरूम से सोने के आभूषण खरीदे गए। इसके बाद इन्हें स्थानीय वित्तीय संस्थानों या साहूकारों के पास गिरवी रखकर गोल्ड लोन लिया गया और प्राप्त नकदी को नए बैंक खातों के जरिए आगे भेज दिया गया। इससे डिजिटल मनी ट्रेल काफी हद तक समाप्त हो गई और जांच एजेंसियों के लिए धन का अंतिम प्रवाह ट्रैक करना कठिन हो गया।
पुलिस का कहना है कि गिरोह बड़ी कंपनियों को पहले से चिन्हित करता था। आरोपी कंपनियों की वेबसाइट से वरिष्ठ अधिकारियों की तस्वीरें और अन्य जानकारी जुटाते थे। इसके बाद विभिन्न बहानों से कंपनी के वित्त विभाग से जुड़े कर्मचारियों के संपर्क नंबर हासिल किए जाते थे। कई मामलों में कर्मचारियों को ईमेल या व्हाट्सएप के जरिए .zip फाइल भेजी जाती थी, जिसमें मौजूद मैलवेयर डिवाइस पर नियंत्रण स्थापित कर लेता था। इसके जरिए व्हाट्सएप वेब सेशन और संपर्क सूची से छेड़छाड़ कर वरिष्ठ अधिकारियों के नाम पर फर्जी संदेश भेजे जाते थे।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “बॉस स्कैम सोशल इंजीनियरिंग का अत्यंत परिष्कृत रूप है, जिसमें तकनीकी हैकिंग से अधिक मानव मनोविज्ञान का दुरुपयोग किया जाता है। साइबर अपराधी वरिष्ठ अधिकारियों की पहचान का लाभ उठाकर कर्मचारियों पर तत्काल भुगतान का दबाव बनाते हैं। किसी भी बड़े वित्तीय लेनदेन से पहले स्वतंत्र माध्यम, जैसे आधिकारिक कॉल, वीडियो सत्यापन या कंपनी की निर्धारित अनुमोदन प्रक्रिया के जरिए निर्देशों की पुष्टि करना अनिवार्य होना चाहिए। केवल व्हाट्सएप संदेश, डिस्प्ले फोटो या सेव किए गए नाम पर भरोसा करना करोड़ों रुपये की ठगी का कारण बन सकता है।”
जांच के दौरान पुलिस ने लगभग 50 प्रतिशत धनराशि पर रोक लगाने में सफलता हासिल की है, जबकि शेष राशि का पता लगाने और गिरोह के सरगना तक पहुंचने के प्रयास जारी हैं। अधिकारियों का मानना है कि इस प्रकार के साइबर गिरोह कई राज्यों में फैले संगठित नेटवर्क के रूप में काम कर रहे हैं और कॉर्पोरेट संस्थानों की आंतरिक भुगतान प्रक्रिया को निशाना बना रहे हैं।
