₹6 लाख की साइबर ठगी मामले की सुनवाई में अदालत ने कहा—मिनटों में वारदात को अंजाम दे रहे अपराधी, लेकिन जांच में देरी से पीड़ितों का पैसा वापस मिलने की संभावना घटती है; राष्ट्रीय स्तर पर समयबद्ध तंत्र बनाने का सुझाव

साइबर ठगी मामलों की जांच में ‘घोंघे जैसी रफ्तार’ पर हाईकोर्ट सख्त, मध्य प्रदेश पुलिस और केंद्र सरकार से मांगा जवाब

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By Roopa
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जबलपुर/भोपाल: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने साइबर ठगी मामलों की जांच में हो रही देरी पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा है कि जहां साइबर अपराधी कुछ ही मिनटों में अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर लोगों से ठगी कर रहे हैं, वहीं जांच एजेंसियों की कार्रवाई “घोंघे जैसी रफ्तार” से आगे बढ़ रही है। अदालत ने कहा कि जांच में होने वाली देरी के कारण पीड़ितों की ठगी गई रकम वापस मिलने की संभावना लगातार कम होती जाती है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने जबलपुर निवासी चैताली मित्रा की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि अप्रैल 2025 में वह ₹6 लाख की साइबर ठगी का शिकार हुई थीं, लेकिन मामले की जांच में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने साइबर अपराधों से निपटने के लिए मौजूदा संस्थागत व्यवस्था पर भी सवाल उठाए और केंद्र सरकार से इस संबंध में स्पष्ट जवाब मांगा।

अदालत ने मामले में असम पुलिस की कार्रवाई की सराहना करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश पुलिस से सूचना मिलने के बाद मुख्य आरोपी को शीघ्र गिरफ्तार किया गया। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि इस प्रकरण ने विभिन्न राज्यों की पुलिस, बैंकों और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय की गंभीर कमी को उजागर किया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि साइबर ठगी के मामलों में लाभार्थी बैंक खातों को तत्काल फ्रीज करने और बैंकिंग जानकारी साझा करने में होने वाली देरी जांच को प्रभावित करती है। अदालत के अनुसार, हर गुजरता घंटा ठगी गई राशि की रिकवरी की संभावना को कम कर देता है, क्योंकि इस दौरान रकम को कई खातों में स्थानांतरित कर उसकी लेयरिंग कर दी जाती है।

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अदालत ने साइबर अपराधों की जांच के लिए प्रौद्योगिकी आधारित, समयबद्ध और राष्ट्रीय स्तर की समन्वित व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। न्यायालय ने सुझाव दिया कि संदिग्ध बैंक खातों को तत्काल फ्रीज करने, राज्यों के बीच रियल-टाइम सूचना साझा करने और पूरे देश में एक समान स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू करने जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जानी चाहिए, ताकि साइबर ठगी के मामलों में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।

प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि साइबर अपराधों में शुरुआती कुछ घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। उनके अनुसार, यदि बैंक, पुलिस, दूरसंचार कंपनियां और जांच एजेंसियां रियल-टाइम में समन्वित कार्रवाई करें, तो बड़ी संख्या में मामलों में ठगी गई रकम को रोका या वापस प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि देरी से की गई कार्रवाई का लाभ अपराधियों को मिलता है, जो कुछ ही मिनटों में धनराशि को कई खातों और डिजिटल चैनलों के माध्यम से स्थानांतरित कर देते हैं।

हाईकोर्ट ने सभी पक्षों के अधिवक्ताओं को साइबर ठगी मामलों से निपटने के लिए प्रभावी संस्थागत ढांचे पर अपने सुझाव प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। साथ ही केंद्र सरकार तथा मध्य प्रदेश, असम, झारखंड और पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ अधिकारियों को अगली सुनवाई 31 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का आदेश दिया है।

अदालत ने संकेत दिया कि साइबर अपराधों की बढ़ती जटिलता को देखते हुए पारंपरिक जांच प्रणाली में सुधार और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय समय की आवश्यकता है, ताकि पीड़ितों को त्वरित राहत मिल सके और साइबर अपराधियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।

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