लखनऊ: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने हापुड़ स्थित मोनाड यूनिवर्सिटी से जुड़े कथित फर्जी डिग्री और मार्कशीट रैकेट में बड़ी कार्रवाई करते हुए आरोपियों की ₹25.44 करोड़ मूल्य की संपत्तियां कुर्क कर ली हैं। कुर्क की गई संपत्तियों में फार्म हाउस, फ्लैट और लग्जरी वाहन शामिल हैं, जिन्हें जांच एजेंसी के अनुसार आरोपियों और उनके परिजनों के नाम पर खरीदा गया था। ईडी का लखनऊ जोनल कार्यालय धन शोधन के पहलुओं की जांच कर रहा है और मामले में वित्तीय लेनदेन, संपत्तियों की खरीद तथा कथित अवैध कमाई के स्रोतों की विस्तृत पड़ताल जारी है।
यह कार्रवाई उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) की जांच के आधार पर दर्ज मामले से जुड़ी है। एसटीएफ ने मोनाड यूनिवर्सिटी से कथित तौर पर फर्जी मार्कशीट, डिग्री, प्रोविजनल सर्टिफिकेट, माइग्रेशन सर्टिफिकेट और अन्य शैक्षणिक दस्तावेज तैयार कर बेचने वाले एक संगठित गिरोह का खुलासा किया था। जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर ईडी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत जांच शुरू की और कथित अपराध से अर्जित संपत्तियों का पता लगाया।
जांच एजेंसियों के अनुसार, एसटीएफ ने 11 अगस्त 2025 को इस मामले में 11 आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। आरोप है कि मोनाड यूनिवर्सिटी के चेयरमैन विजेंद्र सिंह हुड्डा ने संदीप सहरावत और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज तैयार करने और उन्हें बेचने का संगठित नेटवर्क संचालित किया। जांच में यह भी आरोप है कि दस्तावेजों के सत्यापन की व्यवस्था भी कथित तौर पर इसी नेटवर्क के माध्यम से कराई जाती थी, जिससे फर्जी प्रमाणपत्रों को वास्तविक दर्शाने का प्रयास किया जाता था।
प्रारंभिक जांच में 1,800 से अधिक छात्र-छात्राओं को फर्जी डिग्री, मार्कशीट और अन्य शैक्षणिक दस्तावेज उपलब्ध कराए जाने के आरोप सामने आए थे। जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि इन दस्तावेजों का उपयोग किन संस्थानों, नौकरियों या अन्य उद्देश्यों के लिए किया गया तथा इससे जुड़े लाभार्थियों की संख्या कितनी है। मामले के वित्तीय पहलू की जांच में बैंक खातों, डिजिटल भुगतान, संपत्तियों की खरीद और अन्य निवेशों का भी विश्लेषण किया जा रहा है।
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ईडी के अनुसार, जांच में जिन संपत्तियों की पहचान की गई, वे कथित अपराध से अर्जित धन से खरीदी गई प्रतीत होती हैं। इन्हीं निष्कर्षों के आधार पर लगभग ₹25.44 करोड़ मूल्य की अचल और चल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क किया गया है। जांच एजेंसी अब धन के स्रोत, लेनदेन की श्रृंखला और कथित मनी ट्रेल की पड़ताल कर रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि अवैध कमाई को किन-किन माध्यमों से निवेश या स्थानांतरित किया गया।
मामले में डिजिटल साक्ष्यों की भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। जांच एजेंसियां कंप्यूटर, सर्वर, डिजिटल रिकॉर्ड, बैंकिंग दस्तावेज, ईमेल, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से प्राप्त जानकारी का विश्लेषण कर रही हैं। इन साक्ष्यों के आधार पर यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि कथित फर्जी दस्तावेज तैयार करने, सत्यापित कराने और उनकी बिक्री के लिए किस प्रकार का नेटवर्क सक्रिय था तथा इसमें और कौन-कौन लोग शामिल थे।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि डिजिटल युग में फर्जी डिग्री और शैक्षणिक दस्तावेजों के संगठित रैकेट केवल शैक्षणिक व्यवस्था ही नहीं, बल्कि भर्ती प्रक्रियाओं, सरकारी सेवाओं और वित्तीय प्रणाली के लिए भी गंभीर खतरा हैं। उनके अनुसार ऐसे मामलों में डिजिटल फोरेंसिक, वित्तीय विश्लेषण, दस्तावेज सत्यापन और मनी ट्रेल की संयुक्त जांच से पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करने में महत्वपूर्ण मदद मिलती है।
जांच एजेंसियों का कहना है कि मामले की विवेचना अभी जारी है। यदि जांच के दौरान अन्य व्यक्तियों, संस्थाओं या वित्तीय लेनदेन की संलिप्तता सामने आती है, तो उनके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। ईडी और अन्य एजेंसियां उपलब्ध दस्तावेजी, डिजिटल और वित्तीय साक्ष्यों के आधार पर इस कथित रैकेट के सभी पहलुओं की जांच कर रही हैं, ताकि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आगे की विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
