मोहाली: ₹2 करोड़ के चर्चित डिजिटल अरेस्ट साइबर फ्रॉड मामले में मोहाली की विशेष CBI अदालत ने कथित म्यूल अकाउंट धारक कन्हैया लाल की जमानत याचिका खारिज कर दी। आरोपी पर आरोप है कि उसने अपना बैंक खाता साइबर ठगों को उपलब्ध कराया, जिसका इस्तेमाल पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (PSPCL) के सेवानिवृत्त चीफ इंजीनियर से ठगी गई रकम के एक हिस्से को अलग-अलग खातों में घुमाने और निकालने के लिए किया गया।
विशेष CBI न्यायाधीश बलजिंदर सिंह स्रा ने जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि मामले की जांच अभी जारी है, चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है और ठगी गई रकम की बरामदगी भी अभी बाकी है। अदालत ने हालांकि आरोपी को चार्जशीट दाखिल होने के बाद दोबारा जमानत के लिए आवेदन करने की अनुमति दी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत पर दिए गए अवलोकन मामले के अंतिम गुण-दोष को प्रभावित नहीं करेंगे।
CBI ने मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4) के तहत धोखाधड़ी और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66D के तहत मामला दर्ज किया है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 17 मार्च के आदेश के बाद CBI ने यह जांच अपने हाथ में ली थी। मूल FIR जालंधर के साइबर क्राइम पुलिस थाने में दर्ज की गई थी।
जांच के अनुसार, PSPCL के सेवानिवृत्त चीफ इंजीनियर सुखमंदर सिंह 30 अप्रैल 2025 को सेवानिवृत्त हुए थे। आरोप है कि 9 मई 2025 को साइबर ठगों ने उन्हें सरकारी और कानून प्रवर्तन अधिकारियों के रूप में फोन किया। उन्हें बताया गया कि उनके नाम पर जारी SIM कार्ड का इस्तेमाल मुंबई में अवैध गतिविधियों के लिए किया जा रहा है और उनके नाम से जुड़ा बैंक खाता मनी लॉन्ड्रिंग मामले में शामिल है।
ठगों ने कथित तौर पर उन्हें कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारी की धमकी दी और लगातार फोन तथा वीडियो कॉल पर संपर्क बनाए रखा। इस तरीके को डिजिटल अरेस्ट के नाम से जाना जाता है। आरोप है कि ठगों ने WhatsApp के जरिए अलग-अलग बैंक खातों की जानकारी भेजी और RTGS के माध्यम से रकम ट्रांसफर करने के निर्देश दिए। डर और दबाव में सिंह ने 13 मई से 11 जून 2025 के बीच 10 लेनदेन में नौ बैंक खातों में कुल ₹2 करोड़ ट्रांसफर कर दिए। 12 जून को उन्हें ठगी का एहसास हुआ और उन्होंने अधिकारियों से संपर्क किया।
जांच के दौरान CBI ने रकम के प्रवाह को पहले, दूसरे और तीसरे स्तर के लाभार्थी खातों तक ट्रेस किया। एजेंसी के मुताबिक, रकम खाते में पहुंचने के तुरंत बाद कई मामलों में ATM, नकद निकासी, चेक लेनदेन या अन्य खातों में ट्रांसफर के जरिए निकाल ली गई।
इसी मनी ट्रेल में राजस्थान के नागौर निवासी कन्हैया लाल का नाम सामने आया। CBI के अनुसार, 23 मई 2025 को साईस्मृति चैरिटेबल ट्रस्ट के खाते से उसके पंजाब नेशनल बैंक खाते में ₹1.5 लाख जमा हुए थे। जांच में इस खाते को कथित तौर पर ठगी की रकम का पहला लाभार्थी खाता बताया गया।
CBI का आरोप है कि कन्हैया लाल ने इसके बाद ₹45,000 ATM से निकाले, ₹20,000 UPI के जरिए शेर मोहम्मद को भेजे, ₹1,000 भरत गरवा को दिए और ₹90,500 IMPS के माध्यम से ट्रांसफर किए। एजेंसी ने उसे 30 जून को नागौर स्थित उसके घर से गिरफ्तार किया। ट्रांजिट रिमांड के बाद उसे 1 जुलाई को मोहाली की विशेष CBI अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
जमानत मांगते हुए कन्हैया लाल ने खुद को निर्दोष बताया और कहा कि उसे झूठा फंसाया गया है। उसके वकील ने अदालत को बताया कि 30 जून को जारी सर्च वारंट के आधार पर घर की तलाशी में कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई। आरोपी ने दावा किया कि उसने जांच के दौरान बताया था कि उसने अपना PNB खाता नागौर के गजेंद्र नामक व्यक्ति को ₹5,000 में बेच दिया था और खाते से जुड़ा SIM कार्ड भी सौंप दिया था।
CBI ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने साइबर अपराधियों को म्यूल अकाउंट उपलब्ध कराया, जिसका इस्तेमाल ठगी की रकम को कई स्तरों पर घुमाने और निकालने में हुआ। अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले का हवाला देते हुए कहा कि म्यूल अकाउंट उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति की भूमिका आपराधिक साजिश में महत्वपूर्ण हो सकती है और उसे स्वतः केवल सहायक भूमिका नहीं माना जा सकता।
अदालत ने जांच लंबित होने, चार्जशीट दाखिल नहीं होने और ठगी की रकम की बरामदगी बाकी होने को देखते हुए फिलहाल जमानत देने का आधार नहीं पाया और याचिका खारिज कर दी।
