मथुरा: उत्तर प्रदेश के मथुरा में राजस्थान और हरियाणा की सीमा से लगे गांवों का इस्तेमाल साइबर ठगी के नेटवर्क के लिए किए जाने का मामला सामने आया है। पुलिस रिकॉर्ड और जांच में सामने आया है कि गोवर्धन, बरसाना, शेरगढ़, छाता और कोसी क्षेत्र के करीब 18 गांव साइबर अपराधियों के लिए सक्रिय ठिकानों के रूप में उभरे हैं। इन इलाकों को स्थानीय स्तर पर ‘मिनी जामताड़ा’ तक कहा जाने लगा है।
जांच में करीब 7,000 मोबाइल नंबर और 1,400 बैंक खातों का संबंध इन गांवों से जुड़े लोगों तक पहुंचा है। पिछले एक साल में पुलिस ने साइबर ठगी के 177 मामले दर्ज किए और 312 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। हाल में सीमा से लगे आठ गांवों में 17 थानों की टीमों ने कार्रवाई कर करीब 90 संदिग्धों को हिरासत में लिया था।
सीमा की लोकेशन का फायदा उठा रहे ठग
साइबर अपराधियों के लिए यूपी-हरियाणा सीमा का इलाका इसलिए भी मददगार साबित हो रहा है क्योंकि कई गांवों में मोबाइल टावर का कवरेज राज्य की सीमा से बाहर तक पहुंचता है। कोसी कलां के आसपास कई बार उत्तर प्रदेश में मौजूद मोबाइल फोन हरियाणा के टावर से कनेक्ट हो जाते हैं और इसके उलट भी स्थिति बनती है।
पुलिस के मुताबिक, अपराधी इस तकनीकी स्थिति का फायदा उठाकर निगरानी से बचने की कोशिश करते हैं। कार्रवाई शुरू होने पर वे सीमा पार कर दूसरी लोकेशन पर चले जाते हैं, जिससे उनकी गतिविधियों को ट्रैक करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। अब दोनों राज्यों के बीच संयुक्त कार्रवाई और तकनीकी निगरानी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
फर्जी जॉब के नाम पर खुलवाते हैं बैंक खाते
जांच में साइबर ठगी का एक प्रमुख तरीका फर्जी ऑनलाइन नौकरी का लालच देकर लोगों से आधार और अन्य पहचान संबंधी जानकारी हासिल करना सामने आया है। इसके बाद ठग कथित तौर पर फर्जी या अधूरे पते का इस्तेमाल कर बैंक खाते खुलवाते हैं।
इन खातों के डेबिट कार्ड और बैंक किट तक पहुंचने के बाद पंजीकृत मोबाइल नंबर बदल दिए जाते हैं। ऐसे खातों का इस्तेमाल देशभर में ठगी से हासिल रकम प्राप्त करने और उसे दूसरे खातों में स्थानांतरित करने के लिए किया जाता है।
पुलिस को फर्जी वाहन किराये के मामलों का भी पता चला है। ठग आकर्षक मासिक किराये का लालच देकर वेबसाइट और सोशल मीडिया पेज बनाते थे। वाहन मालिकों से फर्जी समझौते कर गाड़ियां लेने के बाद वाहन और आरोपी दोनों गायब हो जाते थे। जांच के दौरान ऐसे कई वाहन बरामद किए गए हैं।
साइबर अपराध का पूरा डिजिटल नेटवर्क खंगाल रही पुलिस
ताजा कार्रवाई के लिए गृह मंत्रालय के National Cyber Crime Reporting Portal और Samanvay Portal से मिले डिजिटल सुरागों का इस्तेमाल किया गया। जांचकर्ताओं ने मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और संदिग्ध गतिविधियों के बीच संबंधों को खंगालकर नेटवर्क की पहचान करने की कोशिश की है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के मुताबिक, सीमा से लगे इलाकों में साइबर अपराध का बढ़ना केवल स्थानीय कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह डिजिटल और वित्तीय नेटवर्क के संगठित इस्तेमाल की ओर संकेत करता है। उनके अनुसार, ऐसे मामलों में सिर्फ आरोपियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होती; फर्जी सिम, बैंक खाते, पहचान दस्तावेज, डिजिटल उपकरण और ठगी की रकम के पूरे प्रवाह की जांच जरूरी है।
गांवों में सामाजिक बहिष्कार की पहल
साइबर अपराध के खिलाफ कुछ गांवों में स्थानीय स्तर पर भी कदम उठाए जा रहे हैं। गोवर्धन के दौलतपुर गांव में हुई सामुदायिक बैठक में साइबर ठगी में शामिल पाए जाने वाले लोगों के सामाजिक बहिष्कार का फैसला लिया गया। बैठक में ऐसे लोगों पर ₹1 लाख का सामुदायिक जुर्माना लगाने की बात भी कही गई।
बैठक के दौरान कथित तौर पर फर्जी पहचान पर हासिल किए गए कई सिम कार्ड नष्ट किए गए और ग्रामीणों ने साइबर अपराध में शामिल नहीं होने की शपथ ली।
कार्रवाई के बावजूद नेटवर्क तोड़ना चुनौती
पुलिस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इस पूरे नेटवर्क की वित्तीय और डिजिटल कड़ियों को तोड़ने की है। केवल स्थानीय स्तर पर आरोपियों की गिरफ्तारी से उन बैंक खातों, सिम कार्डों और डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल बंद नहीं होगा, जिनके जरिए देश के अलग-अलग हिस्सों में बैठे पीड़ितों से रकम ठगी जाती है।
जांच में सामने आए 7,000 मोबाइल नंबर और 1,400 बैंक खातों की कड़ियां इस नेटवर्क के विस्तार का संकेत देती हैं। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इनमें से कितने नंबर और खाते सीधे साइबर ठगी में इस्तेमाल हुए और कितने लोगों ने अपनी पहचान या बैंकिंग जानकारी दूसरों को उपलब्ध कराई।
मथुरा के सीमा क्षेत्र में बढ़ी निगरानी और अंतरराज्यीय समन्वय के बीच जांच एजेंसियों की नजर अब उन लोगों पर भी है जो ठगों को बैंक खाते, सिम कार्ड, पहचान दस्तावेज या अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं।
