भोपाल। मध्य प्रदेश में तेजी से फैल रहे साइबर अपराध ने अब गंभीर रूप ले लिया है। पिछले चार वर्षों में राज्य में साइबर ठगों ने ₹1054 करोड़ से अधिक की रकम ठगी है, जिससे सुरक्षा तंत्र की क्षमता और तैयारी पर सवाल खड़े हो गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इस भारी-भरकम ठगी के मुकाबले रिकवरी बेहद नगण्य रही है, जिससे अपराधियों के हौसले और बुलंद होते दिख रहे हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, 1 मई 2021 से 13 जुलाई 2025 के बीच राज्य में साइबर ठगी के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि में औसतन हर साल करीब ₹263 करोड़ की ठगी हुई, जो यह दर्शाता है कि साइबर अपराध अब छिटपुट घटनाओं तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि संगठित नेटवर्क के रूप में फैल चुका है। रोजाना लोग फर्जी कॉल, लिंक, मैसेज और “डिजिटल अरेस्ट” जैसे नए तरीकों के जरिए ठगी का शिकार बन रहे हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू ठगी गई रकम की रिकवरी को लेकर सामने आया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ₹1054 करोड़ में से केवल लगभग ₹1.94 करोड़ ही वापस मिल पाए हैं। यानी करीब 99.82 प्रतिशत राशि अब तक बरामद नहीं हो सकी है। यह स्थिति न केवल जांच प्रक्रिया की सीमाओं को उजागर करती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि अपराधी तकनीकी रूप से अधिक सक्षम होते जा रहे हैं।
इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी सवाल उठने लगे हैं। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्य सरकार की साइबर सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि प्रदेश में साइबर अपराध से निपटने के लिए न तो पर्याप्त संसाधन हैं और न ही मजबूत ढांचा। लगभग 8 करोड़ की आबादी वाले राज्य में साइबर अपराधों से निपटने के लिए सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर होना चिंता का विषय है।
सिंघार ने यह भी कहा कि कई बड़े राज्यों—जैसे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, बिहार और केरल—में साइबर क्राइम थानों की संख्या अधिक है और वहां विशेष साइबर फॉरेंसिक यूनिट्स भी सक्रिय हैं, जबकि मध्य प्रदेश इस मामले में पीछे नजर आता है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में साइबर फॉरेंसिक डिवीजन का अभाव अपराधियों के लिए बड़ी राहत बन रहा है।
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राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि 2021 से 2023 के बीच प्रदेश में करीब 2100 साइबर अपराध दर्ज हुए, लेकिन इनमें से केवल 191 मामलों में ही सजा हो सकी। यानी दोषसिद्धि दर करीब 9 प्रतिशत रही, जो कानून के डर को कमजोर करती है और अपराधियों को बढ़ावा देती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर अपराध अब केवल तकनीकी चुनौती नहीं रह गया, बल्कि यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी असर डाल रहा है। “डिजिटल अरेस्ट” जैसे मामलों में ठग खुद को पुलिस या सरकारी अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं और तुरंत पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करते हैं।
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “साइबर अपराधी अब सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लेकर लोगों को मानसिक दबाव में लेते हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है, लेकिन इसे असली दिखाने के लिए फर्जी पहचान और तकनीकी साधनों का इस्तेमाल किया जाता है।”
उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को सतर्क रहने और किसी भी अनजान कॉल या लिंक पर तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए। जागरूकता ही इस तरह के अपराधों से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।
वर्तमान हालात यह संकेत देते हैं कि यदि समय रहते साइबर सुरक्षा तंत्र को मजबूत नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह खतरा और बड़ा रूप ले सकता है। मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षित कर्मियों और आधुनिक तकनीक के साथ-साथ आम जनता की जागरूकता ही इस चुनौती से निपटने का सबसे बड़ा हथियार बन सकती है।
