लखनऊ: उत्तर प्रदेश पुलिस के ऑपरेशन CY-VAJRA के तहत लखनऊ में संचालित एक कथित अंतरराष्ट्रीय फर्जी टेक सपोर्ट कॉल सेंटर के भंडाफोड़ के बाद जांच में साइबर ठगी के एक बेहद सुनियोजित मॉडल का खुलासा हुआ है। पुलिस के अनुसार गिरोह नकली Microsoft वायरस अलर्ट, तकनीकी सहायता का झांसा और मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल कर मुख्य रूप से अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाता था। मामले में गिरफ्तार सात आरोपियों से पूछताछ जारी है, जबकि विदेशी सहयोगियों और हवाला नेटवर्क की भी जांच की जा रही है।
प्रारंभिक जांच के अनुसार ठगी की शुरुआत पीड़ितों के कंप्यूटर स्क्रीन पर नकली वायरस और सुरक्षा चेतावनी (पॉप-अप) दिखाने से होती थी। इन संदेशों में दावा किया जाता था कि कंप्यूटर गंभीर मैलवेयर से संक्रमित है और तत्काल सहायता के लिए एक टोल-फ्री नंबर पर संपर्क करना होगा। कॉल करने पर गिरोह के सदस्य स्वयं को Microsoft Technical Support का कर्मचारी बताकर पीड़ितों का विश्वास जीतते थे।
जांच में सामने आया कि आरोपी पीड़ितों से Task Manager, Event Viewer और Command Prompt जैसी सामान्य Windows यूटिलिटी खुलवाते थे और उनमें दिखाई देने वाली सामान्य तकनीकी जानकारी को हैकिंग या वायरस संक्रमण का प्रमाण बताकर डर पैदा करते थे। इसके बाद पीड़ितों को AnyDesk या UltraViewer जैसे रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर इंस्टॉल कराने के लिए राजी किया जाता था, जिससे आरोपी उनके कंप्यूटर पर पूरा नियंत्रण हासिल कर लेते थे।
इसके बाद पीड़ितों को 49 से 129 अमेरिकी डॉलर तक के फर्जी कंप्यूटर सुरक्षा पैकेज बेचने का प्रयास किया जाता था। यदि कोई व्यक्ति आगे भी उनके प्रभाव में रहता, तो उसे गिरोह की दूसरी टीम के पास भेज दिया जाता था। यह टीम स्वयं को अमेरिकी फेडरल ट्रेड कमीशन (FTC) या साइबर सुरक्षा एजेंसी का अधिकारी बताकर दावा करती थी कि पीड़ित का सोशल सिक्योरिटी नंबर, बैंक खाता या पहचान वित्तीय अपराधों से जुड़ गई है और तत्काल सत्यापन नहीं कराने पर बैंक खाते फ्रीज हो सकते हैं।
पुलिस के अनुसार गिरोह पीड़ितों की आर्थिक स्थिति के आधार पर भुगतान का तरीका तय करता था। सीमित धनराशि वाले लोगों से Amazon Gift Cards या Walmart Barcode Payments के माध्यम से भुगतान कराया जाता था, जबकि अधिक संपन्न पीड़ितों को बड़ी नकदी निकालने के लिए कहा जाता था। बाद में अमेरिका में मौजूद गिरोह के सहयोगी स्वयं को अधिकृत अधिकारी बताकर यह नकदी एकत्र करते थे।
जांच एजेंसियों का कहना है कि एकत्र धनराशि में पहले विदेशी सहयोगियों का कमीशन काटा जाता था और शेष रकम कथित तौर पर हवाला नेटवर्क के जरिए भारत भेजी जाती थी। छापेमारी के दौरान बरामद लैपटॉप, मोबाइल फोन, इंटरनेट कॉलिंग उपकरण और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की फोरेंसिक जांच के माध्यम से विदेशी सहयोगियों, वित्तीय लेनदेन और पूरे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का पता लगाया जा रहा है।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “टेक सपोर्ट स्कैम पूरी तरह सोशल इंजीनियरिंग पर आधारित अपराध है, जिसमें डर और तात्कालिकता पैदा कर पीड़ित को सोचने का अवसर नहीं दिया जाता। कोई भी वैध तकनीकी कंपनी बिना अनुरोध के वायरस अलर्ट भेजकर रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर इंस्टॉल नहीं कराती और न ही गिफ्ट कार्ड, बारकोड भुगतान या नकद भुगतान के माध्यम से शुल्क मांगती है। ऐसे किसी भी संदेश या कॉल पर तुरंत संदेह करें और स्वतंत्र माध्यम से उसकी पुष्टि करें।”
पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और यह पता लगाया जा रहा है कि इस गिरोह के तार अन्य अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी नेटवर्क से जुड़े हैं या नहीं। अधिकारियों को उम्मीद है कि डिजिटल फोरेंसिक और वित्तीय जांच के आधार पर पूरे नेटवर्क का खुलासा किया जा सकेगा।
