लखनऊ: साइबर ठगों ने डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर इंदिरानगर की 75 वर्षीय बुजुर्ग महिला रत्ना कौल से कथित तौर पर ₹78.50 लाख ठग लिए। जालसाजों ने खुद को एटीएस और सीबीआई अधिकारी बताकर महिला को अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग गिरोह से जुड़े होने का आरोप लगाया। इसके बाद फर्जी गिरफ्तारी वारंट दिखाकर उन्हें छह दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखा गया। ठगों ने हर 30 मिनट में वीडियो कॉल पर उपस्थित रहने का आदेश दिया और ऐसा नहीं करने पर गिरफ्तारी की धमकी दी। पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और अब तक ₹22 लाख फ्रीज कराने का दावा किया है।
रवींद्रपल्ली, हरिनगर निवासी रत्ना कौल के पति अजय कौल का वर्ष 2009 में निधन हो चुका है। वह घर में अकेली रहती हैं। पुलिस के अनुसार, 13 अगस्त को उनके व्हाट्सएप पर एक अनजान नंबर से कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को एटीएस अधिकारी बताया और दावा किया कि महिला के आधार कार्ड का इस्तेमाल कर मुंबई में केनरा बैंक का एक खाता चलाया जा रहा है।
जालसाजों ने कथित तौर पर इस खाते का इस्तेमाल गंभीर आपराधिक गतिविधियों में होने की बात कही। महिला पर अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग गिरोह से जुड़े होने का आरोप लगाया गया। इसके बाद उन्हें मुंबई जेल भेजने की धमकी दी गई। अचानक लगे इन आरोपों और गिरफ्तारी के डर से महिला कथित तौर पर जालसाजों के निर्देशों का पालन करने लगीं।
इसके बाद ठगों ने खुद को सीबीआई और एटीएस के अधिकारी बताकर लगातार छह दिनों तक महिला को डिजिटल अरेस्ट में रखा। कॉल करने वालों ने अपने नाम श्री मिश्रा, प्रदीप सावंत, संदीप और विजय खन्ना बताए। जालसाज हर समय वीडियो कॉल के जरिए महिला पर नजर रखने का दावा करते रहे। उन्हें हर 30 मिनट में वीडियो कॉल पर उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया। कॉल मिस होने या किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क करने पर तत्काल गिरफ्तारी की धमकी दी जाती थी।
ठगों ने महिला को विश्वास दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट और पुलिस विभाग की मुहर लगे कथित गिरफ्तारी वारंट भी दिखाए। वीडियो कॉल के दौरान कुछ लोग पुलिस की वर्दी में दिखाई दिए। इस पूरी कवायद का मकसद महिला को यह विश्वास दिलाना था कि उनके खिलाफ वास्तव में किसी बड़ी आपराधिक जांच में कार्रवाई चल रही है।
जांच के नाम पर जालसाजों ने महिला से उनके बैंक और डाकघर खातों में जमा रकम के बारे में जानकारी ली। जब उन्हें वहां अपेक्षाकृत कम राशि होने का पता चला तो उन्होंने फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी के बारे में पूछताछ की। इसके बाद 14 अगस्त को महिला को बैंक जाने और एफडी तुड़वाने के लिए मजबूर किया गया।
पुलिस के मुताबिक, एफडी की रकम निकालने के बाद महिला से जालसाजों द्वारा बताए गए अलग-अलग बैंक खातों में कुल ₹78.50 लाख ट्रांसफर करा लिए गए। रकम ट्रांसफर होने के बाद भी जालसाज कथित तौर पर महिला पर लगातार दबाव बनाए रखते रहे। बाद में मामले की जानकारी पुलिस तक पहुंची और साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई गई।
पीड़िता ने पुलिस को ठगों के छह मोबाइल नंबर उपलब्ध कराए हैं। इन नंबरों को तकनीकी सर्विलांस के जरिए ट्रेस किया जा रहा है। पुलिस बैंक खातों, लेनदेन और रकम के आगे हुए ट्रांसफर की जानकारी जुटाकर आरोपियों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।
साइबर क्राइम पुलिस के अनुसार, त्वरित कार्रवाई करते हुए ₹22 लाख की रकम फ्रीज करा दी गई है। संबंधित बैंकों से खातों की विस्तृत जानकारी भी मांगी गई है। जांच में यह पता लगाया जा रहा है कि ठगी की रकम किन खातों में गई और वहां से उसे आगे किन खातों में भेजा गया।
यह मामला एक बार फिर डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते खतरे को सामने लाता है। साइबर ठग अक्सर पुलिस, सीबीआई, ईडी या अन्य जांच एजेंसियों के अधिकारी बनकर पीड़ितों को गिरफ्तारी का डर दिखाते हैं। फर्जी दस्तावेज और वीडियो कॉल पर वर्दी का इस्तेमाल कर वे दबाव बढ़ाते हैं और इसी डर के बीच बैंक खातों से रकम ट्रांसफर करा लेते हैं। पुलिस मामले में शामिल आरोपियों और संभावित नेटवर्क की तलाश कर रही है।
