लखनऊ: शहर की एक निजी कंपनी में बड़े वित्तीय घोटाले का मामला सामने आया है, जहां सहायक प्रबंधक और एक वरिष्ठ कार्यकारी पर कई वर्षों में ₹4.73 करोड़ के गबन का आरोप लगा है। शिकायत के आधार पर विभूतिखंड थाने में मामला दर्ज किया गया है, जिसमें आरोप है कि विक्रेताओं और किसानों के लिए निर्धारित भुगतान को सुनियोजित तरीके से अन्य खातों में ट्रांसफर किया गया।
शिकायत के अनुसार, इस कथित गड़बड़ी का खुलासा 4 फरवरी 2026 को वित्तीय वर्ष 2025–2026 के लिए किए गए आंतरिक ऑडिट के दौरान हुआ। ऑडिट में भुगतान रिकॉर्ड में गंभीर विसंगतियां सामने आईं, जिनसे पता चला कि वास्तविक लाभार्थियों के बजाय धनराशि दूसरे खातों में भेजी जा रही थी। इसके बाद कंपनी ने विस्तृत जांच शुरू की, जिसमें कई संदिग्ध लेन-देन सामने आए।
शिकायतकर्ता के अनुसार, दोनों आरोपी कई वर्षों से कंपनी में कार्यरत थे और उन्हें वित्तीय एवं प्रशासनिक कार्यों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई थी। एक अधिकारी अगस्त 2014 से और दूसरा मई 2017 से कंपनी में कार्यरत था। लंबे समय तक सिस्टम तक पहुंच और भरोसे का फायदा उठाकर इन अनियमितताओं को अंजाम देने का आरोप है।
आंतरिक जांच में यह सामने आया कि विक्रेताओं और किसानों को किए जाने वाले भुगतान में आंशिक रूप से कटौती कर धनराशि को अन्य खातों में डायवर्ट किया जा रहा था। कई मामलों में वास्तविक लाभार्थियों तक पूरी रकम नहीं पहुंची। जांच टीम को ऐसे पैटर्न मिले, जिनसे संकेत मिलता है कि परिवहन शुल्क का एक हिस्सा नियमित रूप से हड़पा जा रहा था।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि करीब 390 विक्रेताओं के खातों को प्रभावित किया गया, जिनमें परिवहन शुल्क का लगभग 0.4 प्रतिशत हिस्सा लगातार निकाला जाता रहा। छोटे-छोटे कटौतियों के रूप में की गई इस हेराफेरी ने समय के साथ बड़ी रकम का रूप ले लिया। जांचकर्ताओं का मानना है कि इस तरीके से लंबे समय तक संदेह से बचा गया, क्योंकि हर लेन-देन में गड़बड़ी बहुत कम दिखती थी।
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जांच के दौरान एक और गंभीर तथ्य सामने आया, जो किसानों के भुगतान से जुड़ा है। कंपनी लगभग 4000 किसानों को नियमित भुगतान करती है, लेकिन दस्तावेजों की जांच में पाया गया कि कम से कम 15 मामलों में किसानों के नाम के आगे दर्ज बैंक खाते वास्तव में आरोपियों से जुड़े हुए थे। इससे बिना जानकारी के भुगतान डायवर्ट होता रहा।
जब किसानों को भुगतान नहीं मिला और उन्होंने शिकायत की, तो उन्हें कथित रूप से भ्रामक जानकारी देकर शांत कराया गया। यह पैटर्न इस बात की ओर इशारा करता है कि गड़बड़ी को छिपाने और लंबे समय तक जारी रखने की कोशिश की गई।
मामला उस समय और गंभीर हो गया जब ऑडिट टीम ने आरोपियों से स्पष्टीकरण लेने की तैयारी की। इसके तुरंत बाद दोनों अधिकारी छुट्टी पर चले गए—एक 7 फरवरी से और दूसरा 10 फरवरी 2026 से। जांच के अहम चरण में उनकी अनुपस्थिति ने संदेह को और मजबूत कर दिया।
इसके बाद 11 फरवरी 2026 को दोनों आरोपी कंपनी के प्रबंध निदेशक से मिले और शिकायत के अनुसार गबन में अपनी भूमिका स्वीकार की। एक ने ₹2.5 करोड़ और दूसरे ने ₹2 करोड़ के गबन की बात मानी। इन स्वीकारोक्तियों और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।
वरिष्ठ स्तर से निर्देश मिलने के बाद अब औपचारिक रूप से केस दर्ज कर लिया गया है। प्रारंभिक जांच में आरोपों की पुष्टि होने के संकेत मिले हैं और अब विस्तृत जांच में बैंक लेन-देन, दस्तावेज और वित्तीय रिकॉर्ड की गहन पड़ताल की जा रही है।
अधिकारियों के अनुसार, जांच का मुख्य फोकस मनी ट्रेल का पता लगाना और यह जानना है कि इस पूरे मामले में कोई अन्य व्यक्ति शामिल था या नहीं। साथ ही कंपनी के आंतरिक नियंत्रण और निगरानी तंत्र की भी समीक्षा की जाएगी।
यह मामला दर्शाता है कि यदि वित्तीय सिस्टम की निगरानी कमजोर हो, तो लंबे समय में बड़े पैमाने पर गबन संभव हो सकता है। जांच आगे बढ़ने के साथ इस पूरे घोटाले के और पहलू सामने आने की संभावना है।
