भोपाल/कोलकाता: फर्जी दस्तावेजों के जरिए भारतीय पहचान हासिल करने की संगठित साजिश के मामले में सुरक्षा एजेंसियों ने कोलकाता से पांच अफगान नागरिकों को गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई इंटर-स्टेट फर्जी पासपोर्ट नेटवर्क की जांच के दौरान की गई। नई गिरफ्तारी के बाद इस मामले में पकड़े गए लोगों की कुल संख्या 11 हो गई है, जिनमें आठ विदेशी नागरिक शामिल हैं।
बेनियापुकुर और भवानीपुर से गिरफ्तारी
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान रजा खान (28), जियाउल रहमान (30), सुल्तान मोहम्मद (27), सैयद मोहम्मद (35) और जफर खान (23) के रूप में हुई है। अधिकारियों के अनुसार ये लोग कई वर्षों से कोलकाता के बेनियापुकुर और भवानीपुर इलाकों में रह रहे थे और फर्जी पासपोर्ट तथा अन्य दस्तावेजों के जरिए अपनी असली पहचान छिपा रहे थे।
जबलपुर का फर्जी पता, ट्रांजिट रिमांड पर भेजे गए आरोपी
जांच में पता चला है कि आरोपियों के पास मौजूद पासपोर्ट में उन्हें मध्य प्रदेश के जबलपुर का निवासी दिखाया गया था। अधिकारियों को संदेह है कि जन्म प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र और अन्य पहचान दस्तावेज तैयार करने के लिए इंटर-स्टेट नेटवर्क सक्रिय था। आरोपियों को स्थानीय अदालतों में पेश करने के बाद ट्रांजिट रिमांड पर जबलपुर भेज दिया गया, जहां उनसे गहन पूछताछ की जा रही है।
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मुख्य साजिशकर्ता सोहबत खान की भूमिका
एजेंसियों के मुताबिक इस नेटवर्क का मुख्य संचालक अफगान नागरिक सोहबत खान था, जो पिछले लगभग दस वर्षों से भारत में अवैध रूप से रह रहा था। जांच में सामने आया है कि खान ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए भारतीय पहचान प्रणाली में घुसपैठ की योजना बनाई थी।
फर्जी दस्तावेजों से आधार, पैन और पासपोर्ट
सूत्रों के अनुसार खान ने 2015 में फर्जी पते और जन्म प्रमाणपत्र का इस्तेमाल करके ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया था। बाद में उसी दस्तावेज के आधार पर उसने आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी हासिल करने की कोशिश की। 2020 में उसने फर्जी कागजात के जरिए भारतीय पासपोर्ट भी प्राप्त कर लिया।
प्रति पासपोर्ट लाखों की वसूली
जांचकर्ताओं ने बताया कि खान बाद में पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में अवैध रूप से रह रहे अफगान नागरिकों को पासपोर्ट दिलाने में मदद करने लगा। इसके लिए वह प्रति पासपोर्ट करीब एक से सवा लाख रुपये तक वसूलता था। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि इस नेटवर्क में कम से कम 30 विदेशी नागरिक शामिल हो सकते हैं।
महाराष्ट्र से भी जुड़े सुराग
जांच के दौरान एजेंसियों को महाराष्ट्र के अकोला शहर से भी सुराग मिले हैं। पूछताछ में पता चला कि आरोपियों के वहां स्थित एक धार्मिक स्थल से संपर्क थे, जहां पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में रह रहे अवैध प्रवासियों से मुलाकात होती थी।
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इस नेटवर्क के तार पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ तक फैले हुए हैं। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि क्या यह रैकेट किसी बड़े संगठित आपराधिक गिरोह या अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज तस्करी नेटवर्क का हिस्सा है।
स्थानीय सहयोग की भी जांच
प्रारंभिक जांच में जबलपुर के तीन स्थानीय लोगों की भूमिका भी सामने आई है। आरोप है कि जिला कलेक्टरेट के चुनाव सेल में कार्यरत वनरक्षक दिनेश गर्ग, चंदन ठाकुर और महेंद्र कुमार सुखदाम ने फर्जी निवास और जन्म प्रमाणपत्र तैयार करने में मदद की थी। इन आरोपों की भी विस्तृत जांच की जा रही है।
अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मामला अभी शुरुआती जांच चरण में है और आगे और गिरफ्तारी होने की संभावना से इनकार नहीं किया गया है। एजेंसियां वित्तीय लेनदेन, संपर्क नेटवर्क और फर्जी दस्तावेज तैयार करने के तरीकों की भी जांच कर रही हैं।
