मुंबई। शहरी नियोजन नियमों की खुली अनदेखी और कथित धोखाधड़ी के आधार पर खड़ी की गई 16 मंजिला इमारत पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए उसे ध्वस्त करने का आदेश बरकरार रखा है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने उल्हासनगर स्थित “झलक पैराडाइज” नामक इमारत को लेकर दाखिल याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि इस निर्माण के लिए प्राप्त मंजूरियां “भ्रामक जानकारी और गलत प्रस्तुतियों” के आधार पर हासिल की गई थीं, इसलिए पूरी इमारत अवैध है और इसे गिराया जाना ही कानूनसम्मत कार्रवाई होगी।
अदालत की दो सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता डेवलपर ने न केवल नगर निगम को गुमराह किया, बल्कि दस्तावेजों में भी गंभीर विसंगतियां सामने आईं। अदालत ने इस पूरे प्रकरण को “सिस्टम को प्रदूषित करने वाला मामला” बताते हुए संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि मंजूरी देते समय आवश्यक जांच-पड़ताल नहीं की गई।
मामले में सामने आया कि डेवलपर ने 2021 की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया था कि संबंधित भूखंड 24 मीटर और 36 मीटर विकास योजना (डीपी) सड़कों से प्रभावित नहीं है। हालांकि, उसी दौरान यह भी स्वीकार किया गया कि डीपी रोड के प्रभाव के चलते 386.68 वर्ग मीटर भूमि समर्पित की गई थी। अदालत ने इसे स्पष्ट विरोधाभास मानते हुए कहा कि डेवलपर को अतिक्रमण की जानकारी थी, इसके बावजूद गलत जानकारी देकर मंजूरी हासिल की गई।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब कोई पक्ष “गंदे हाथों” के साथ न्यायालय के समक्ष आता है, तो उसे किसी भी प्रकार की राहत या सहानुभूति का हक नहीं होता। इसी आधार पर डेवलपर की याचिका खारिज करते हुए यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि अवैध निर्माण को किसी भी स्थिति में संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
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यह इमारत उल्हासनगर-5 क्षेत्र में झलक कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा बनाई गई थी, जिसमें कुल 65 फ्लैट और चार दुकानें शामिल हैं। जांच में पाया गया कि इमारत का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा डीपी सड़कों पर अतिक्रमण कर बना है। 36 मीटर रिंग रोड और 24 मीटर डीपी रोड के ऊपर निर्माण होने के बावजूद आवश्यक 9.7 मीटर की दूरी के स्थान पर मात्र 3 मीटर का ही मार्जिन छोड़ा गया था।
इस मामले की शुरुआत वर्ष 2024 में हुई थी, जब शिकायतकर्ताओं ने इस निर्माण को लेकर नगर निगम का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद जांच में अनियमितताएं सामने आईं और इमारत को अवैध घोषित करते हुए आंशिक ध्वस्तीकरण का आदेश दिया गया था। बाद में डेवलपर ने इस आदेश को अदालत में चुनौती दी, लेकिन अब हाई कोर्ट ने भी इस कार्रवाई को पूरी तरह सही ठहराया है।
अदालत ने नगर निकायों को “योजना आधारित शहरी विकास के संरक्षक” बताते हुए कहा कि उन्हें अवैध निर्माण के खिलाफ सख्त रुख अपनाना चाहिए। साथ ही, यह भी निर्देश दिया गया कि जिन अधिकारियों की लापरवाही या मिलीभगत सामने आई है, उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए।
डेवलपर द्वारा सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए चार सप्ताह की राहत की मांग भी अदालत ने ठुकरा दी। फैसले में साफ कहा गया कि इस तरह के मामलों में देरी से कानून का उद्देश्य प्रभावित होता है, इसलिए तत्काल कार्रवाई आवश्यक है।
यह मामला एक बार फिर शहरी क्षेत्रों में अवैध निर्माण, फर्जी मंजूरियों और प्रशासनिक लापरवाही की गंभीर समस्या को उजागर करता है। अदालत के इस सख्त रुख को भविष्य में ऐसे मामलों पर अंकुश लगाने के रूप में देखा जा रहा है, जहां नियमों को दरकिनार कर बड़े पैमाने पर निर्माण किया जाता है।
