TRAI-CBI अधिकारी बनकर लोगों को डराया, ₹21 लाख की ठगी; संगठित नेटवर्क के कई आरोपी जांच के दायरे में

‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर फ्रॉड पर बड़ी कार्रवाई: ₹16.86 लाख की संपत्ति जब्त, फर्जी एजेंसी बनाकर ठगी करने वाला गिरोह बेनकाब

Roopa
By Roopa
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श्रीनगर। कश्मीर में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर की जा रही साइबर ठगी के एक बड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अहम कार्रवाई करते हुए ₹16.86 लाख की रकम अटैच की है। यह रकम एक बैंक खाते में पाई गई, जिसे जांच में इस साइबर फ्रॉड नेटवर्क का हिस्सा बताया गया है। मामले ने एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि कैसे अपराधी खुद को सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर आम लोगों को मानसिक दबाव में लाकर ठगी को अंजाम दे रहे हैं।

जांच के मुताबिक, यह मामला एक संगठित साइबर गिरोह से जुड़ा है, जिसमें आरोपी गौरव कुमार, गुरप्रीत सिंह और उज्जवल चौहान समेत कई अन्य लोग शामिल बताए जा रहे हैं। आरोप है कि इन लोगों ने मिलकर एक सुनियोजित साजिश के तहत ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर पीड़ित से बड़ी रकम ऐंठी।

प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के अनुसार, ₹16,86,465 की राशि को ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ मानते हुए मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत अटैच किया गया है। यह रकम दिल्ली के करोल बाग स्थित एक बैंक खाते में जमा थी, जिसे “एम/एस जीविका फाउंडेशन” के नाम से संचालित किया जा रहा था। जांच में सामने आया कि यह खाता ठगी के पैसों को जमा करने और आगे ट्रांसफर करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था।

इस पूरे मामले की शुरुआत अक्टूबर 2024 में दर्ज एक एफआईआर से हुई थी, जिसमें पीड़ित ने शिकायत दी थी कि उसे फोन कॉल और डिजिटल माध्यमों के जरिए यह बताया गया कि वह एक मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंस चुका है और उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। आरोपियों ने खुद को TRAI और CBI जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों का अधिकारी बताते हुए पीड़ित को विश्वास में लिया और फिर उसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ की धमकी दी।

जांच में यह सामने आया कि आरोपियों ने पीड़ित को इतना मानसिक दबाव में डाल दिया कि उसने अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट तक तोड़ दी और कुल ₹21 लाख की रकम आरोपियों द्वारा बताए गए खाते में ट्रांसफर कर दी। बाद में, अदालत के आदेश पर ₹4.13 लाख की आंशिक राशि पीड़ित को वापस कर दी गई, जबकि शेष ₹16.86 लाख अब भी ट्रेस होकर उसी खाते में मिली, जिसे अब अटैच कर लिया गया है।

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इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि इसमें पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक दबाव और डर का इस्तेमाल किया गया। पीड़ित को यह विश्वास दिलाया गया कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर अपराध में फंस चुका है और यदि वह तुरंत सहयोग नहीं करता, तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा। इसी डर के चलते उसने बिना सत्यापन किए रकम ट्रांसफर कर दी।

साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे नए तरीके तेजी से सामने आ रहे हैं, जहां अपराधी कानून प्रवर्तन एजेंसियों की पहचान का दुरुपयोग कर रहे हैं। प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “साइबर अपराधी अब तकनीक के साथ-साथ सोशल इंजीनियरिंग का भी आक्रामक इस्तेमाल कर रहे हैं। वे पीड़ित के मन में डर और तात्कालिकता पैदा कर निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करते हैं, जिससे लोग जल्दबाजी में बड़ी गलतियां कर बैठते हैं।”

जांच एजेंसियों ने संकेत दिए हैं कि यह कोई अकेला मामला नहीं है, बल्कि एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है, जो देशभर में इस तरह की ठगी को अंजाम दे रहा है। फिलहाल, इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान करने और उनकी भूमिका की जांच की जा रही है।

यह मामला एक बार फिर यह स्पष्ट करता है कि साइबर ठग अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर अधिक परिष्कृत और मनोवैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में आम लोगों के लिए यह बेहद जरूरी हो गया है कि वे किसी भी अनजान कॉल, सरकारी अधिकारी के नाम पर आने वाले संदेश या ‘तत्काल कार्रवाई’ के दबाव में आने से पहले पूरी तरह जांच-पड़ताल करें।

जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में इस मामले में और भी खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

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