बेंगलुरु: कर्नाटक में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर साइबर ठगी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां 81 वर्षीय एक कारोबारी को करीब 40 दिनों तक मानसिक दबाव में रखकर ₹15 करोड़ से अधिक की ठगी कर ली गई। खुद को केंद्रीय जांच एजेंसी का अधिकारी बताने वाले साइबर अपराधियों ने मनी लॉन्ड्रिंग के झूठे आरोप लगाकर पीड़ित को इस हद तक डराया कि उसने अपनी पूरी जमा पूंजी गंवा दी।
शिकायत के मुताबिक, घटना की शुरुआत 5 फरवरी की सुबह करीब 9:15 बजे एक फोन कॉल से हुई। कॉल करने वाले ने खुद को एक वरिष्ठ जांच अधिकारी बताया और दावा किया कि कारोबारी के नाम पर दो सक्रिय सिम कार्ड चल रहे हैं, जिनका इस्तेमाल अवैध गतिविधियों में किया जा रहा है। इसके साथ ही, उसे यह भी बताया गया कि उसका संपर्क जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल से जुड़ा हुआ है।
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आरोपियों ने पीड़ित को विश्वास दिलाया कि उसके नाम पर ₹25 लाख की मनी लॉन्ड्रिंग की गई है और बदले में उसे ₹5 लाख कमीशन मिला है। इस आरोप ने कारोबारी को पूरी तरह से घबरा दिया। इसके बाद शुरू हुआ ‘डिजिटल अरेस्ट’ का सिलसिला, जिसमें उसे लगातार कॉल और वीडियो कॉल के जरिए निगरानी में रखा गया।
साइबर ठगों ने पीड़ित को निर्देश दिया कि वह किसी से संपर्क न करे और अपने सभी वित्तीय लेनदेन उनके निर्देशों के अनुसार ही करे। उसे बताया गया कि यह एक ‘गुप्त जांच’ का हिस्सा है और सहयोग नहीं करने पर उसे तुरंत गिरफ्तार किया जा सकता है। इस डर के कारण पीड़ित ने धीरे-धीरे अपने सभी निवेश खत्म करने शुरू कर दिए।
करीब छह हफ्तों के दौरान, कारोबारी को अपने शेयर पोर्टफोलियो को बेचने और फिक्स्ड डिपॉजिट तुड़वाने के लिए मजबूर किया गया। हर ट्रांजेक्शन के बाद उसे पैसे अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करने के निर्देश दिए गए। इस पूरी प्रक्रिया में ठग लगातार उसके संपर्क में रहे और उसे यह विश्वास दिलाते रहे कि जांच पूरी होने के बाद उसकी रकम वापस कर दी जाएगी।
18 मार्च को मामला तब सामने आया, जब पीड़ित ने आखिरकार पूरी घटना की शिकायत दर्ज कराई। शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह पूरी साजिश बेहद योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दी गई, जिसमें पीड़ित को मानसिक रूप से पूरी तरह नियंत्रित कर लिया गया था।
विशेषज्ञों का कहना है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर अपराधियों का नया हथकंडा है, जिसमें वे खुद को किसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं और उन्हें मानसिक रूप से अलग-थलग कर देते हैं। इस दौरान पीड़ित को किसी से बात करने या सलाह लेने से रोका जाता है, जिससे वह पूरी तरह अपराधियों के प्रभाव में आ जाता है।
प्रख्यात साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “डिजिटल अरेस्ट के मामलों में अपराधी भय और अधिकार का दुरुपयोग करते हैं। वे खुद को जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर पीड़ित को मनोवैज्ञानिक दबाव में रखते हैं और उसे अकेला कर देते हैं, जिससे वह बिना सोचे-समझे हर निर्देश का पालन करने लगता है।”
उन्होंने आगाह किया कि किसी भी जांच एजेंसी द्वारा फोन या वीडियो कॉल के जरिए इस तरह की कार्रवाई नहीं की जाती। ऐसे मामलों में तुरंत कॉल काटकर स्थानीय साइबर हेल्पलाइन या पुलिस से संपर्क करना चाहिए।
यह घटना बताती है कि साइबर ठगी अब सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक जाल बन चुकी है, जहां डर, दबाव और भ्रम के जरिए लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। विशेषकर बुजुर्ग और उच्च संपत्ति वाले लोग ऐसे मामलों में ज्यादा संवेदनशील साबित हो रहे हैं, जिससे अपराधियों के लिए यह आसान लक्ष्य बनते जा रहे हैं|
