चकेरी/Kanpur: स्क्रैप कारोबार की आड़ में फर्जी फर्म बनाकर करोड़ों रुपये की टैक्स ठगी का एक बड़ा मामला सामने आया है। आरोप है कि एक महिला ने बिना किसी वास्तविक खरीद-फरोख्त के फर्जी टैक्स इनवॉइस और ई-वे बिल तैयार कर लगभग ₹2 करोड़ की इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) हड़प ली। मामले की जांच के बाद राज्यकर विभाग की अनुसंधान शाखा ने आरोपित के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है।
जांच अधिकारियों के अनुसार, अनवरगंज क्षेत्र की निवासी रुपाली ने स्क्रैप कारोबार के नाम पर “आरके ट्रेडर्स” नाम से एक फर्म का पंजीकरण कराया था। दस्तावेजों में इस फर्म का कार्यालय गणेशपुर मोड़ के पास दर्शाया गया था। शुरुआती तौर पर फर्म पूरी तरह वैध दिखाई दे रही थी, लेकिन जब इसके लेन-देन और गतिविधियों की गहराई से जांच की गई, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
आरोप है कि वर्ष 2024 और 2025 के दौरान इस फर्म के नाम पर बड़े पैमाने पर फर्जी टैक्स इनवॉइस और ई-वे बिल बनाए गए। इन दस्तावेजों के आधार पर आईटीसी का दावा किया गया, जबकि वास्तव में कोई माल की खरीद या बिक्री नहीं हुई थी। इस तरह की गतिविधि को टैक्स प्रणाली में “फेक बिलिंग” के रूप में जाना जाता है, जिसके जरिए बिना वास्तविक व्यापार के ही टैक्स क्रेडिट हासिल कर लिया जाता है।
मामले का खुलासा तब हुआ जब राज्यकर विभाग की अनुसंधान शाखा को संदिग्ध लेन-देन की जानकारी मिली। इसके बाद संबंधित फर्म के दस्तावेजों, जीएसटी रिटर्न और ई-वे बिल रिकॉर्ड की जांच शुरू की गई। जांच में पाया गया कि दिखाए गए ट्रांजेक्शन और वास्तविक गतिविधियों के बीच कोई मेल नहीं है, जिससे फर्जीवाड़े की आशंका मजबूत हो गई।
जांच टीम ने जब फर्म के घोषित पते—गणेशपुर मोड़—पर जाकर सत्यापन किया, तो वहां कोई व्यावसायिक गतिविधि नहीं मिली। न तो वहां कोई कार्यालय संचालित हो रहा था और न ही स्क्रैप से जुड़ा कोई कारोबार। इस तथ्य ने यह स्पष्ट कर दिया कि फर्म केवल कागजों पर मौजूद थी और इसका इस्तेमाल टैक्स ठगी के लिए किया जा रहा था।
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अधिकारियों का मानना है कि इस पूरे मामले में फर्जी इनवॉइस और ई-वे बिल के जरिए एक सुनियोजित तरीके से आईटीसी का लाभ उठाया गया। इस तरह की धोखाधड़ी से न केवल सरकारी राजस्व को नुकसान होता है, बल्कि टैक्स प्रणाली की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जीएसटी व्यवस्था में आईटीसी एक महत्वपूर्ण तंत्र है, जिसका उद्देश्य व्यवसायों को दोहरे कराधान से राहत देना है। लेकिन जब इसका दुरुपयोग फर्जी दस्तावेजों के जरिए किया जाता है, तो यह प्रणाली के लिए गंभीर चुनौती बन जाता है। ऐसे मामलों में डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल ट्रैकिंग की भूमिका बेहद अहम होती है।
मामले में रिपोर्ट दर्ज होने के बाद अब आगे की जांच में यह भी देखा जा रहा है कि क्या इस फर्जी फर्म के जरिए अन्य कंपनियों या व्यक्तियों को भी लाभ पहुंचाया गया। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि इस पूरे नेटवर्क में और कौन-कौन शामिल हो सकता है।
अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के मामलों पर सख्ती से कार्रवाई की जाएगी और दोषियों के खिलाफ कानूनी प्रावधानों के तहत कठोर कदम उठाए जाएंगे। साथ ही अन्य संदिग्ध फर्मों और लेन-देन की भी जांच तेज कर दी गई है, ताकि ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
यह मामला एक बार फिर यह दर्शाता है कि डिजिटल टैक्स सिस्टम में पारदर्शिता के बावजूद फर्जीवाड़े के नए तरीके सामने आ रहे हैं। ऐसे में निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि सरकारी राजस्व की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और ईमानदार कारोबारियों के हितों की रक्षा हो सके।
