कानपुर (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश पुलिस और साइबर सेल ने कानपुर के कल्याणपुर क्षेत्र में संचालित कथित फर्जी दस्तावेज निर्माण गिरोह का खुलासा किया है। पुलिस के अनुसार, साइबर कैफे की आड़ में चल रहे इस नेटवर्क के जरिए करीब 70 तरह के फर्जी सरकारी और शैक्षणिक दस्तावेज तैयार किए जा रहे थे। जांच में गिरोह के कजाकिस्तान कनेक्शन और विदेशी नंबरों से संचालित डिजिटल नेटवर्क के संकेत मिलने के बाद पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है।
पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपी तेजस पाल इस कथित गिरोह का मुख्य संचालक था और कल्याणपुर क्षेत्र में आनंदेश्वर ऑनलाइन कैफे चलाता था। जांच एजेंसियों का आरोप है कि आरोपी फर्जी पोर्टल, डिजिटल टेम्पलेट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का इस्तेमाल कर विभिन्न राज्यों के सरकारी दस्तावेज तैयार करते थे। हालांकि, पुलिस के आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और जांच के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगी।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि आरोपी करीब एक वर्ष से कजाकिस्तान के नंबरों से संचालित व्हाट्सएप और टेलीग्राम समूहों से जुड़े हुए थे। पुलिस के अनुसार, इन्हीं डिजिटल समूहों के माध्यम से कथित रूप से फर्जी पोर्टल के लिंक, लॉगिन आईडी और पासवर्ड उपलब्ध कराए जाते थे। जांच एजेंसियां अब इन ऑनलाइन समूहों से जुड़े अन्य लोगों और विदेशी संपर्कों की जानकारी जुटा रही हैं।
पुलिस का आरोप है कि गिरोह ई-डिस्ट्रिक्ट सहित करीब आठ फर्जी पोर्टल का उपयोग करता था। इन पोर्टल पर मोबाइल नंबर दर्ज करते ही संबंधित व्यक्ति की जानकारी उपलब्ध होने का दावा किया गया है। इसके बाद आरोपी पोर्टल के वॉलेट को रिचार्ज कर कुछ ही मिनटों में दस्तावेज तैयार कर लेते थे। जांच के अनुसार, कथित रूप से दो से दस मिनट के भीतर प्रमाणपत्र तैयार करने की सुविधा उपलब्ध कराई जाती थी।
पुलिस के मुताबिक, आरोपी उत्तर प्रदेश, ओडिशा, दिल्ली, हरियाणा सहित कई राज्यों के शिक्षा बोर्ड की कथित फर्जी मार्कशीट, स्नातक और परास्नातक डिग्री, डिप्लोमा, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र, निवास, जाति और आय प्रमाणपत्र सहित अन्य दस्तावेज तैयार करते थे। जांच एजेंसियों का कहना है कि आधार कार्ड में बदलाव जैसे कार्यों के लिए भी लोगों से मोटी रकम वसूली जाती थी। आरोप है कि दस्तावेज तैयार करने के लिए ग्राहकों से ₹17 हजार से लेकर ₹1 लाख तक की रकम ली जाती थी।
डीसीपी वेस्ट के अनुसार, पूछताछ में आरोपी तेजस पाल ने कथित रूप से बताया कि पोर्टल से दस्तावेज तैयार करने के बाद उन पर संबंधित विभागों, संस्थानों और अधिकारियों की फर्जी मुहर लगाई जाती थी। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से कई सरकारी कार्यालयों और अधिकारियों के नाम वाली कथित फर्जी मुहरें बरामद करने का दावा किया है। इनमें कल्याणपुर विधायक के नाम वाली मुहर भी शामिल होने की बात कही गई है।
जांच के दौरान पुलिस को टेलीग्राम और व्हाट्सएप समूहों से जुड़े कई मोबाइल नंबरों की जानकारी मिली है। पुलिस के अनुसार, इन नंबरों का संबंध उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश, हरियाणा, बिहार, जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश और असम जैसे राज्यों से भी सामने आया है। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस नेटवर्क से कितने लोग जुड़े थे और कितने फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए।
Future Crime Research Foundation से जुड़े साइबर एवं डिजिटल अपराध विशेषज्ञों के अनुसार, फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले संगठित गिरोह अक्सर डिजिटल प्लेटफॉर्म, विदेशी सर्वर, मैसेजिंग एप और नकली ऑनलाइन पोर्टल का इस्तेमाल कर अपनी गतिविधियों को संचालित करते हैं। ऐसे मामलों में डिजिटल फोरेंसिक, सर्वर लॉग, भुगतान रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक संचार की जांच से नेटवर्क की वास्तविक संरचना और उससे जुड़े लोगों की पहचान करने में मदद मिलती है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस कार्रवाई या गिरफ्तारी मात्र से किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध नहीं होता। अभियोजन पक्ष को अदालत में डिजिटल साक्ष्य, दस्तावेजी रिकॉर्ड और अन्य प्रमाणों के आधार पर आरोप साबित करने होंगे। सभी आरोपियों को कानून के अनुसार निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त है।
पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है। जब्त कंप्यूटर, मोबाइल फोन, डिजिटल स्टोरेज उपकरण और ऑनलाइन गतिविधियों की फोरेंसिक जांच कराई जा रही है। जांच में यदि अन्य आरोपी, अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की भूमिका सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
