कानपुर। कानपुर में शिक्षा के नाम पर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां एक महिला ने आरोप लगाया है कि उसके किरायेदार ने बेटे का डी-फार्मा कोर्स में दाखिला कराने के बहाने ₹2.5 लाख की ठगी कर ली और बाद में फर्जी प्रमाणपत्र थमा दिया। रावतपुर थाना क्षेत्र के इस मामले ने एक बार फिर यह उजागर किया है कि कैसे एडमिशन रैकेट छात्रों और उनके परिवारों की उम्मीदों का फायदा उठा रहे हैं।
शिकायत के अनुसार, पीड़िता सरिता मिश्रा, जो मसवानपुर के शिव नगर इलाके की निवासी हैं, ने अपने किरायेदार सुकांत कुमार उर्फ कुन्ना पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया है। मूल रूप से ओडिशा का रहने वाला आरोपी उनके घर में किरायेदार के रूप में रह रहा था और धीरे-धीरे उसने परिवार का विश्वास जीत लिया।
आरोपी ने पीड़िता को भरोसा दिलाया कि वह उनके बेटे का डी-फार्मा कोर्स में दाखिला करा सकता है और कोर्स पूरा होने के बाद नौकरी भी दिला देगा। उसने यह भी दावा किया कि उसके शैक्षणिक संस्थानों में अच्छे संपर्क हैं और पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन तरीके से पूरी की जाएगी, जिससे मामला पूरी तरह वैध और भरोसेमंद लगे।
उसकी बातों में आकर पीड़िता ने हामी भर दी। आरोपी ने एडमिशन और अन्य प्रक्रियाओं के नाम पर ₹5 लाख की मांग की। शुरुआत में उसने ₹2.5 लाख दो किस्तों में नकद ले लिए और भरोसा दिलाया कि बाकी रकम एडमिशन की पुष्टि के बाद ली जाएगी।
समय बीतता गया, यहां तक कि कोरोना काल भी गुजर गया, लेकिन न तो एडमिशन की कोई पुष्टि हुई और न ही किसी संस्थान से कोई आधिकारिक जानकारी मिली। जब भी परिवार ने इस बारे में पूछताछ की, आरोपी प्रक्रिया में देरी का बहाना बनाकर बात को टालता रहा।
आखिरकार, जब पीड़िता ने दबाव बनाया, तो आरोपी ने एक डी-फार्मा प्रमाणपत्र थमा दिया और दावा किया कि कोर्स पूरा हो चुका है। हालांकि दस्तावेज देखकर परिवार को संदेह हुआ।
सत्यापन के लिए पीड़िता ने इसे एक साइबर कैफे में दिखाया, जहां जांच में यह प्रमाणपत्र पूरी तरह फर्जी पाया गया। यह किसी भी आधिकारिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खा रहा था, जिससे स्पष्ट हो गया कि न तो कोई वास्तविक दाखिला हुआ था और न ही कोर्स पूरा किया गया था।
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इस खुलासे के बाद पीड़िता ने आरोपी से पैसे वापस मांगे। लेकिन मामला सुलझाने के बजाय आरोपी ने उन्हें शिवली रोड स्थित टिकरा क्षेत्र के गजेंद्र सिंह से संपर्क करने को कहा और दावा किया कि वही पूरी प्रक्रिया देख रहा है।
जब पीड़िता ने गजेंद्र सिंह से संपर्क किया, तो उसने भी गोलमोल जवाब दिए और प्रक्रिया जारी होने की बात कहकर टालमटोल करता रहा। इससे यह आशंका और गहरी हो गई कि यह एक संगठित ठगी का मामला हो सकता है।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब पीड़िता ने पैसे वापस लेने और पुलिस में शिकायत करने की बात कही। आरोप है कि इसके बाद सुकांत कुमार, गजेंद्र सिंह और शैलेंद्र कुमार ने मिलकर उन्हें जान से मारने और झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी दी।
डरी-सहमी पीड़िता ने आखिरकार पुलिस का सहारा लिया और रावतपुर थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और आरोपियों की भूमिका की गहराई से जांच की जा रही है।
जांच अधिकारियों का कहना है कि मामले को कई पहलुओं से देखा जा रहा है, जिसमें आरोपियों का आपराधिक इतिहास, पैसों के लेनदेन और संभावित नेटवर्क की जांच शामिल है। आशंका है कि इस गिरोह ने अन्य लोगों को भी इसी तरह अपना शिकार बनाया हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की शैक्षणिक ठगी के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है, खासकर डी-फार्मा, पैरामेडिकल और तकनीकी पाठ्यक्रमों में, जहां एडमिशन की मांग अधिक होती है। ठग सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल कर पहले भरोसा जीतते हैं और फिर धीरे-धीरे बड़ी रकम ऐंठ लेते हैं।
Future Crime Research Foundation से जुड़े एक विशेषज्ञ के अनुसार, “इस तरह के मामलों में ठग खुद को अंदरूनी संपर्क वाला बताकर पीड़ित का विश्वास जीतते हैं। पैसे मिलने के बाद या तो फर्जी दस्तावेज दे देते हैं या लंबे समय तक प्रक्रिया के नाम पर गुमराह करते रहते हैं।”
प्रशासन ने लोगों को सलाह दी है कि किसी भी एजेंट या व्यक्ति के जरिए एडमिशन लेने से पहले संबंधित संस्थान से सीधे जानकारी लें और बिना पुख्ता दस्तावेज के नकद लेनदेन से बचें।
फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच में जुटी है और पैसों के लेनदेन का पूरा ब्यौरा खंगाला जा रहा है। आने वाले दिनों में और खुलासे होने तथा अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी की संभावना जताई जा रही है।
यह मामला एक बार फिर यह संकेत देता है कि शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और सतर्कता कितनी जरूरी है। डिजिटल दौर में थोड़ी सी लापरवाही भी भारी आर्थिक नुकसान और मानसिक परेशानी का कारण बन सकती है।
